युधिष्ठिर ने गंधर्व द्वारा प्राप्त तक क्यों गंवा दी? अर्जुन ने महादेव का तप क्यों किया?

युधिष्ठिर ने गंधर्व द्वारा प्राप्त तक क्यों गंवा दी? अर्जुन ने महादेव का तप क्यों किया?

by Jaywant Pandya
महाभारत की कहानी, वही भारत की कहानी- लेखांक-५
कल लिखना रह गया था। इस लिए आज (२३ अप्रैल २०२०) ‘महाभारत’ के चार एपिसॉड की बात एक साथ।
पहला। गंधर्व और कौरवो की लडाई। यह बात समजनी चाहिए कि चोसर के खेल में जीतने के बाद दुर्योधन का व्यवहार बदल गया था। वह बुजुर्गो जो केवल बुजुर्ग ही नहीं थे, किन्तु हस्तिनापुर राज्य में उच्च पद पर आसीन थे, उन का अपमान करने लगा था। द्रौपदी का वस्त्राहरण के बाद स्त्री के प्रति उस की दृष्टि बदल गई थी। अब प्रश्न यह था कि दुर्योधन, दुःशासन और कर्ण आदि पांडव जहां थे उस वन में क्यों आये? इस के पीछे भी कुटिल राजनीति है। राजनीति केवल लडाई या संबंध अच्छे अथवा बुरे करने से नहीं खेली जाती। राजनीति में सामनेवाले पक्ष का मनोबल गिराना भी होता है। उस पर व्यंग करना भी होता है। तो शकुनि ने दुर्योधन, दुःशासन आदि को पांडवो की खराब स्थिति पर व्यंग करने को भेजा था। किन्तु वहां जाते ही वे उद्दंड और स्वेच्छाचारी हो गये।
कई लोग एसे होते है। वह जब पर्यटन पर जाते है तो स्वेच्छाचारी हो जाते है। इसी लिए आयु में बडे मित्र की बात याद आती है कि किसी का वास्तविक स्वभाव जानना हो तो उस के साथ पर्यटन पर जाना चाहिए। दुर्योधन-दुःशासन और कर्ण वन में आकर मदिरापान करने लगे। स्त्रियों का नाच देखने लगे। एसे में दुर्योधन ने स्थानिक गंधर्व जाति की एक लडकी को छेड दिया। रात में आने का न्योता दे दिया। इस पर गंधर्व आक्रोशित हुए और दुर्योधन को बंदी बना लिए। गंधर्वो ने यहां तक कहा कि वे पांडवो जैसे नहीं है जो अपनी स्त्री का अपमान होते देखे।
उसी समय दुर्योधन का अंगरक्षक युधिष्ठिर के पास सहाय की गुहार लगाता है। युधिष्ठिर सब भूल कर भीम और अर्जुन को मदद के लिए जाने को कहते है। भीम-अर्जुन विरोध करते है तो युधिष्ठिर फिर से इमॉशनल ब्लेकमेइल कर के कहते है कि इस स्थिति में वे स्वयं जाएंगे। अतः भीम और अर्जुन जाते है। वे गंधर्व से बात कर के ही मुद्दा सुलजा देते है। उन का कहना था कि उसे छोड दे नहीं तो उन से युद्ध करें। चूं कि गंधर्व पांडव विरोधी नहीं थे इस लिए भीम कहता है कि दुर्योधन और दुःशासन को मारने की उस ने प्रतिज्ञा ली है इस लिए वह दंड दे देगा। इसी लिए गंधर्व दुर्योधन को छोड देते है किन्तु इस से दुर्योधन में पांडवो के प्रति उपकार, सहानुभूति या स्नेह के स्थान पर धिक्कार की भावना ओर मजबूत होती है। वह अपने अंगरक्षक को मार डालता है।
यहां पर फिर से युधिष्ठिर का अपने परिवार को एकजूट रखने की भावना दिखती है। वह कहते है कि यदि हमारे आपस के झघडे में तीसरे को लाभ उठाने दिया तो ये अच्छी बात नहीं होगी। ये बात सही है किन्तु तब जब परिवार में एक-दो बार सामान्य भूल हो। किन्तु जब षडयंत्र रचे जाए और वह भी राजनीति में तब शठम् प्रति शाठ्यता यह नीति अपनानी चाहिए। और इस बात की तुलना जयचंद द्वारा मोहम्मद घोरी को साथ देने से नहीं हो सकती। क्योंकि यह किसी बाहरी देश के लोगों को साथ देना नहीं था। उनको सामने से आक्रमण करने का न्योता देना नहीं था। उनको साथ देना भी इस में आता नहीं था। और दुर्योधन की करतूत भी एसी थी जो क्षमालायक नहीं थी। यदि एसे (आज की कानूनी परिभाषा में उसे बलात्कारी ही कहा जाएगा) बलात्कारी का रक्षण किया गया, उसे बचाया गया तो वह ओर बलात्कार करेगा। दूसरा, यह भी कि यदि दूश्मन के दूश्मन को मित्र बनाया जाए तो वह राजनीति ही है, किन्तु यहां तो गंधर्व पांडवो के प्रति सन्मान और आदर रखते ही थे, तो काम ओर भी सरल था। तो युधिष्ठिर ने फिर यहां पर अधर्म के प्रति उदारता दिखाई। और यदि दुर्योधन का सरलता से कांटा निकालने दिया होता तो न तो महाभारत के युद्ध में उस के भतीजे अभिमन्यु, घटोत्कच, द्रौपदी के पुत्रो की हत्या होती, न तो भीष्म पितामह, द्रौण, कृपाचार्य, कर्ण आदि को भी मरना न पडता। युद्ध में इतने बडे स्तर पर अनीति न होती। न तो श्री कृष्ण को गांधारी का शाप मिलता और यादव कुल का सर्वनाश होता। युधिष्ठिर स्वयं को ‘नरो वा कुंजरो वा’ का अर्धसत्य न बोलना पडता और उन का रथ भी धरा पर न आ जाता। युधिष्ठिर भी वनवास में जाने के समय से ही जानते ही थे कि युद्ध अवश्यंभावि है तो फिर इतनी उदारता किस लिए? इस लिए राजा को चाहिए कि वह धर्म को तो अनुसरे किन्तु जब शत्रु अधर्म को अनुसरता हो, अनीति करता हो तो उस को उसी की भाषा में जवाब देना चाहिए।
श्री कृष्ण अर्जुन को दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए तप करने को कहते है। अर्जुन पहले इन्द्र को प्रसन्न करते है और फिर इन्द्र उस को महादेवजी का तप करने की सलाह देते है। आज के संदर्भ में यह देखें तो युद्ध करना ही है, यह अवश्यंभावि ही है तो उस से पहले आप को पर्याप्त तैयारी करनी चाहिए। अनेक राजाओं से मित्रता करनी चाहिए। विरोधीओं को एक्स्पॉझ करना चाहिए। और यदि अपने बलबूते पर शस्त्रास्त्र नहीं निर्माण कर सकते तो दूसरों के पास से शस्त्रास्त्र प्राप्त करना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पीछले साडे पांच वर्ष से यही कर रहे है। युपीए सरकार ने तो पर्पाय्त वित्त न होने के कारण शस्त्र खरीदी पर रोक लगा दी थी। अगस्ता वेस्टलेन्ड हेलिकॉप्टर खरीदी में घोटाले का आरोप भी है। किन्तु मोदीजी की जिन विदेश यात्रा की आलोचना यहां का विपक्ष और सेक्युलर मिडिया करता रहा इस के परिणाम स्वरूप आज अधिकतर देशों के साथ भारत के संबंध अच्छे है। शस्त्रास्त्र भी पर्याप्त खरीदे जा रहे है। ओर तो ओर कोरोना की दवाई निर्यात करने के साथे भारत ने अमरिका से जहाज विरोधी मिसाइल का सौदा कर लिया।
श्री कृष्ण की अर्जुन को यह सलाह इस लिए भी थी कि दुर्योधन तो युवराज है, इस लिए हस्तिनापुर की पूरी सेना उस के साथ है। भीष्म, द्रौण, कृपाचार्य, अंगराज कर्ण, अश्वत्थामा आदि तो उस का साथ देंगे ही, किन्तु जयद्रथ, शाल्व राजा आदि कई राजा भी हस्तिनापुर में भीष्म, विदूर, द्रौण, कृपाचार्य महारथी होने के कारण एक शक्तिशाली राज्य होने के कारण उनके पक्ष से लडनेवाले थे, अस्त्र-शस्त्र और धन का भंडार हस्तिनापुर के पास था। श्री कृष्ण थे किन्तु वह पर्याप्त नहीं थे। क्योंकि बलराम का स्नेह भीम जितना ही दुर्योधन के लिए भी था।
पांडव के स्थान पर कोई ओर होता तो वनवास के दुःख का रोना रोकर बैठ जाते। कदाचित सन्यासी भी हो जाते। किन्तु श्री कृष्ण जैसे मार्गदर्शक होने के कारण उन्हों ने वनवास का उपयोग अपने आप को मजबूत करने के लिए किया। द्रौपदीने प्रति दिन पांडवो को अपने अपमान और उनकी निःसहायता का स्मरण कराये रखा।
इसी बात से पता चलता है कि यदि हम अपने इतिहास- वह चाहे गौरवशाली हो या अपने अपमान का, वह भूल जाते है और अपने आप को मजबूत नहीं करते तो हमें वनवास ही मिलता रहेगा। जब भी भारत के प्रति पाकिस्तान के रवैये की बात आती है तब सेक्युलर मिडिया और बुद्धुजीवी कहते के पुराना इतिहास भूल जाओ। मोगलकालीन इतिहास हम भूल गये, फिर मोपला दंगे भी भूल गये, फिर डायरेक्ट ऍक्शन भी भूल गये, फिर पाकिस्तान अलग होना भी भूल गये, विभाजन के समय लोगों को जो तकलीफ हुई वह भी भूल गये, उस के बाद कश्मीर पर आक्रमण कर के आधा काश्मीर पचाना भूल गये, अक्षय चीन चीन को सौंपना भूल गये, उस के बाद १९६५ का युद्ध और लालबहादूर शास्त्री का विदेश में निधन भूल गये, १९७१ का युद्ध भूल गये (भले ही भारत की विजय हुई हो किन्तु भारतीय सेना को हानि तो हुई), कश्मीर में हिन्दूओ को बलात खदेडना भूल गये, १९९० से लेकर देश में बम्ब धमाके भूल गये, १९९९ का कारगील युद्ध भूल गये, २००८ के मुंबई हमले, जयपुर बम्ब धमाके, अमदावाद बम्ब धमाके भूल गये और हम पाकिस्तान के साथ मैच खेलने लगे, पाकिस्तानी कलाकारों की आवभगत करने लगे, उनको हिन्दी फिल्मों में हमारे कलाकारो को भूखा छोड काम देने लगे, पाकिस्तानी पूर्व विदेशी मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी की किताब का विमोचन वही मुंबई में करने लगे जहां पर कसाब आणि गेन्ग ने हमला किया था। आज भी कोरोना वाइरस की आपत्ति में कश्मीर में प्रति दिन हो रहे पाकिस्तानी गोलाबारी भूल गये।
युधिष्ठिर के प्रकार हर नेता को शासन में आते ही यह साबित करना पडता है कि वह पाकिस्तान से युद्ध नहीं चाहता। और मंत्रणा करता है। फिर पाकिस्तान रूपी दुर्योधन शकुनि जैसे आईएसआई की सलाह पर चाल चलता है। जैसे आज के एपिसोड में शकुनि ने एक राक्षस को अर्जुन को मारने भेजा। हम महाभारत से कुछ नहीं सिखे। दुर्वासा जैसे ऋषि की अच्छाई का उपयोग भी शकुनि और दुर्योधन ने पांडवो को श्राप देने के लिए किया। आज भी भारत में कई साधु-संथ और ऋषि जैसे लोग है। प्रचारक है। उन में भी कई दुर्वासा जैसे है जो बार-बार पांडवो की परीक्षा लेते रहते है। पांडव उन की परीक्षा पर बारबार खरे उतरने का प्रयास करते है। सत्ता में आये तो अनेक वचनों की पूर्ति तुरंत हो जाए एसी मांग होने लगती है। जो दुर्योधन कभी मांग पूरी नहीं करता और ऋषि के आने पर मुंह फुलाता है उस का दोष किसी को नही दिखता।
एसा नहीं था कि कौरवो में कोई अच्छा नहीं था। युयुत्सु और विकर्ण जैसे लोग थे। वह सत्य समजाते भी थे। किन्तु वह कौरवो द्वारा अत्याचार रोकने में असमर्थ थे। और बलशाली-बुद्धिशाली और अपने आप को ‘तटस्थ’ अथवा निष्पक्ष दिखाने की लालसा में पांडवो के पक्ष में न्याय और धर्म है यह जानते हुए भी भीष्म-द्रौण-कृपाचार्य और विदूर धृतराष्ट्र-दुर्योधन और शकुनि को रोक नहीं सके। शकुनि को लाक्षागृह के पश्चात् तुरंत क्यों गांधार भेज नहीं दिया गया? आज भी शकुनि जैसे अर्बन नक्सली, एनजीओ और विदेशीओं के एजन्ट जैसे अरुंधति रोय भारत में कार्यरत् है। पांडवो को मारने के षडयंत्र में लाक्षागृह में आग लगाई गई तो भी उन्हों ने दुर्योधन के विरुद्ध कुछ भी नहीं किया। हस्तिनापुर का विभाजन कर के पांडवो को एक उज्जड धरा दे दी। पांडव अर्थात् भारत ने अपने परिश्रम से भारत को समृद्ध किया तो चौसर अर्थात् मंत्रणा के टेबल पर आने को विवश किया। मंत्रणा के टेबल पर हम १९६५, १९७१ दो दो बार हारे। जीतने की शर्त भी उन की और हारने की शर्त भी उनकी। देश का नेतृत्व उन की शर्त मानता गया। खेल दुर्योधन और युधिष्ठिर के बीच था किन्तु उसमें शकुनि रूपी युएन, अमरिका, रशिया, चीन आदि को डालते रहे।
आज के काल में कहानी वही है, लेकिन युधिष्ठिर वाले नियम नहीं चल सकते। श्री कृष्ण ने भी बार-बार युद्ध टालने का प्रयास किया। लाक्षागृह के पश्चात वनवास, चौसर के बाद वनवास स्वीकारा। और उस के पश्चात् भी विष्टि। विष्टि करने गये श्री कृष्ण को बंदी बनाने का प्रयास दुर्योधन ने किया। आज के काल में पाकिस्तान, नक्सलवाद, चीन आदि शठ कौरवों से भी अधिक अधर्मी, अनैतिक है। शठम् प्रति शाठ्यम् से ही विजय मिल सकेगी। किन्तु एक बात तब भी सत्य थी। आज भी सत्य है। पांडवो की एकता। शकुनि ने चौसर के खेल के बाद पांडवो में फूट पडाने का प्रयास किया। किन्तु उन में कभी फूट नहीं पडी। आज के काल में भी पांडवो में दलित, नारी, किसान, मातापिता का अनादर, स्त्री को दारू-सिगारेट पीता बताकर-चरित्रहीनता की ओर ले जाए एसा विकृत मनोरंजन, ड्रग्ज द्वारा युवा पीढी को निशान बनाना आदि अनेक फॉल्ट लाइन ढूंढ के फूट खडी करने का प्रयास होता है। उस में कुछ हद तक सफलता मिल भी जाती है, और यही चिंता का विषय है।

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