विराट युद्ध में कौरवों को अकेले हरानेवाले अर्जुन अंतिम युद्ध में क्यों निराश हो गये?

विराट युद्ध में कौरवों को अकेले हरानेवाले अर्जुन अंतिम युद्ध में क्यों निराश हो गये?

by Jaywant Pandya

धुष्टद्युमन और राजा द्रुपद को युद्ध अंतिम विकल्प है ऐसा समजाते हुए श्री कृष्ण

महाभारत की कहानी, वही भारत की कहानी- लेखांक ८

कल पॉस्ट करना संभव नहीं हो पाया था, इस लिए महाभारत के चार प्रकरण (२७-२८ अप्रैल २०२० के चार एपिसॉड) की बात एक साथ।

पांडवो का अज्ञातवास समाप्त होने को आया था। उसी समय दुर्योधन को शकुनि सुझाव देता है कि वह मत्स्य देश पर आक्रमण कर दे। (यह हम पिछले लेखांक में देख चूके है) मत्स्य देश के पडोसी राज्य त्रिगट के राजा सुशर्मा की भी दृष्टि मत्स्य देश पर थी। किंचक के वध के पश्चात वह मत्स्य देश पर आक्रमण करे और दूसरी और से दुर्योधन- भीष्म-आचार्य द्रोण-कृपाचार्य-कर्ण-दुर्योधन के साथ आक्रमण करें। पांडव को प्रगट होना ही पडेगा।

एसा ही होता है। कंक अर्थात् युधिष्ठर के कहने पर मत्स्य देश के राजा विराट भीम, सहदेव और नकुल को सुशर्मा के विरुद्ध लडाई लडने ले जाते है। और यहां समाचार आता है कि कौरव सेना आक्रमण कर रही है। इन का सामना करने के लिए बचते है केवल युवराज उत्तर। उत्तर अपनी माता, बहन उत्तरा, बृहन्नला, सैरंध्री के आगे डिंगे हांकता है और लडाई लडने के लिए तत्पर होता है। किन्तु सैरंध्री के कहने पर बृहन्नला को ले जाने के लिए तैयार होता है।

किन्तु सेना को देखकर युवराज जो बहोत ही छोटी आयु का था, किन्तु उस आयु में श्री राम, श्री लक्ष्मण ने अनेक राक्षसों को मारा था, परंतु उत्तर का साहस जवाब दे देता है। इस स्थिति में बृहन्नला उस वृक्ष के पास उत्तर को ले जाती है जहां पर पांडवोने अपने शस्त्र छुपाये थे। अब बृहन्नला अपना वास्तविक परिचय देने पर विवश हो जाती है। अर्जुन का शंखनाद सूनकर दुर्योधन जान जाता है कि यही अर्जुन है। वह गायों को लेकर भागता है किन्तु अर्जुन उत्तर को सारथि के रूप में रथ दक्षिण दिशा में दुर्योधन के पीछे ले जाने का आदेश देते है। उसे रोकने के लिए भीष्म बाण चडाते है। किन्तु इस बार अर्जुन भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण आदि के विरुद्ध इतना भीषण युद्ध करता है कि सभी को परास्त कर देता है। दुर्योधन को भी।

यहां पर प्रश्न यह उठता है कि जिस अर्जुन ने अकेले ही पूरी कौरव सेना को परास्त कर दिया था, वो अर्जुन महाभारत के अंतिम भीषण युद्ध में क्यों निराश हो गये? इस का उत्तर आज की स्थिति में मुझे जो सूजा है वह इस प्रकार है। हो सकता है इस पर ओर चिंतन के बाद भविष्य में मुझे कुछ ओर दृष्टिकोण मिलें।

पहली बात तो यह है कि अर्जुन प्रतिशोध की अग्नि में इतना जल रहा था कि बात मत पूछो। बचपन से पांडवो के साथ कौरवों ने जो कुछ किया था, भीम को मारने का षडयंत्र, लाक्षागृह, द्युत क्रीडा में अपमान, प्रिय द्रौपदी का चीरहरण, वनवास, अज्ञातवास, अज्ञातवास में दास के रूप में रहना, विशेष रूप से अर्जुन को नपुंसक बृहन्नला के रूप में रहना पडा, तो प्रतिशोध का अग्नि कितना प्रबल होगा यह सोचो। उसने कुछ वर्ष पहेले ही तप किया था। तप के बाद व्यक्ति का प्रभाव-उस की शक्ति बढ जाती है, किन्तु जैसे जैसे दिन बीतते है, सांसारिक कर्मों के कारण तप में लीन न होने के कारण पूर्व किया हुए तप का प्रभाव-शक्ति घटने लगती है। यह मोबाइल की बेटरी जैसा है। बैटरी आपने रिचार्ज कर दी है। लेकिन धीरे धीरे क्षीण होती जाती है। यदि आप सतत चार्ज में रखे तो बेटरी चालु रहेगी। क्षीण नहीं होगी। तो अर्जुन की बैटरी उस समय पूर्ण चार्ज्ड थी। प्रतिशोध अपने चरम पर था। पहली बार सामना हुआ था। इस लिए पूरी शक्ति उसने झोंक दी। भीष्म- द्रोण, कृपाचार्य आदि स्वजनों का विचार नहीं आया जो कि गीता के समय आया था। सभी को मूर्छित कर दिया था। उत्तरा ने कौरवों के वस्त्र की मांग की थी सो उत्तर को अर्जुन ने कौरवों के वस्त्र निकालने के लिए भी कहा। वस्त्र निकाले गये किन्तु भीष्म-द्रोण-कृपाचार्य के नहीं।

तो प्रश्न अब यह है कि यही अर्जुन अंतिम महायुद्ध में क्यों निराश हो जाते है? वह क्यों युद्ध लडने से मना करते है?

इस से पहले यह बात जान लेना चाहिए कि अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का विवाह उत्तरा के साथ होता है। इस विवाह में जाने के लिए भीष्म दुर्योधन को और धृतराष्ट्र को ना बोलते है। वह मान जाते है। कारण यह है कि वह बूरी तरह से अकेले अर्जुन से हारे हुए थे। प्रतिशोध अपने चरम पर था। हो सकता है विवाह में ही कुछ घर्षण हो जाए। दूसरा द्रुपद में भी द्रोण के प्रति बैर था। किन्तु यहां यह बात समजनी चाहिए कि अभिमन्यु-उत्तरा के विवाह के कारण पांडवो ने महायुद्ध के लिए अपने पक्ष में एक ओर राज्य को जोड लिया। प्राचीन समय में इस प्रकार विवाह दो राज्यों के बीच अच्छे संबंध का प्रतीक था।

तो अर्जुन की मनोदशा संबंधित प्रश्न का उत्तर भी कल और आज के चार एपिसॉड में ही देखने को मिल गया। इस युद्ध के बाद अब पांडव का परिचय मत्स्य देश के राजा विराट के सामने प्रगट हो जाता है। अब द्रुपद, धृष्टद्युमन, शिखंडी और श्री कृष्ण भी आते है। चर्चा होती है कि अब युद्ध करना ही चाहिए। द्रुपद और उनके पुत्र तो स्वाभाविक है द्रौपदी के साथ जो हुआ इस के कारण युद्ध लडने पर उतारु थे। शिखंडी तो पूर्वजन्म में अंबा था जिसने भीष्म को मारने के लिए तप किया था। किन्तु श्री कृष्ण शांति प्रस्ताव का प्रस्ताव करते है। वह समजाते है कि आक्रमण का आरोप युधिष्ठर पर नहीं आना चाहिए। बलराम भी श्री कृष्ण के शांति प्रस्ताव का समर्थन करते हुए जो बात करते है वह आज की स्थिति में अधिक उचित है। वह कहते है कि व्यर्थ जल बहाना भी जल का अपमान है, ये तो रक्त बहाने की बात है। सोचिए जब इतनी जनसंख्या नहीं थी, जल भरपूर था, तब भी बलराम जिस को किसान अपने देवता मानते है, वह पानी का महत्त्व समजाते है। शांति प्रस्ताव के पीछे उनका तर्क यह भी है कि पहली बार द्युत क्रीडा में द्रौपदी के वस्त्राहरण के उपरांत धृतराष्ट्र ने इन्द्रप्रस्थ आदि सब लौटा दिया था। वह समजते है कि युधिष्ठर को द्युत नहीं खेलना चाहिए था। और वहां विदूर, भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य आदि विद्वान भी है जो महाराज को समजाएंगे। किन्तु वह भूल जाते है कि पहली बार उन्हों ने जो इन्द्रप्रस्थ लौटाया था उस के पीछे द्रौपदी के शाप की भीति थी। पांडवो द्वारा प्रतिशोध का डर था। द्रौपदी के वस्त्राहरण के कारण लज्जा भी थी। किन्तु इस के बाद दूसरी दृ्युत क्रीडा में जीत के बाद दुर्योधन जैसे और निर्लज्ज, मनमानी करनेवाला हो गया था वैसे धृतराष्ट्र भी इन्द्रप्रस्थ न लौटाया जाए एसा निर्णय कर चूके थे। तो, भीम दुर्योधन को मारने और दुःशासन के लहु पीने की प्रतिज्ञा की थी। वह उस की बात करते है। तब श्री कृष्ण जो बात करते है वह सभी सज्जनों को समजने लायक है। वह कहते है, प्रतिज्ञा का महत्त्व मानव कल्याण और शांति से अधिक नहीं है।

इस से पूर्व मैं लिख चूका हूं कि भीष्म अपनी प्रतिज्ञा और उस के मिथ्या अर्थघटन के साथ बंधे रहे। दुर्योधन की अनीतिओ में साथ देते रहे। उन्हों ने गोपनीय रूप से अंतःपुर में राजा धृतराष्ट्र और दुर्योधन का विरोध अवश्य किया, किन्तु सार्वजनिक रूप से कदापि नहीं। भीष्म कदाचित अपने आप को महान साबित करना चाहते होंगे, ऐसा नहीं चाहते होगे तो भी प्रतिज्ञा से जुडे रहे। उन्हों ने हस्तिनापुर का वास्तविक हित सर्वोपरी रखा होता तो उनको अपनी प्रतिज्ञा (सत्यवती के कहने पर चित्रवीर्य-विचित्रवीर्य की मृत्यु के पश्चात अथवा दुर्योधन द्वारा बारंबार अनीति होने पर) तोड देते किन्तु उन्हों ने अपनी मिथ्या प्रतिष्ठा को सर्वोपरी रखा और वह बहाना बनाते रहे कि उन्हों ने हस्तिनापुर की रक्षा की प्रतिज्ञा की है, हस्तिनापुर का हित उनके लिए सर्वोपरी है।

तो पहली बार पांचाल नरेश द्रुपद के राजपुरोहित पांडवो की ओर से शांति प्रस्ताव लेकर जाते है। तब दुर्योधन उस का अपमान करता है। वह कहता है कि चूंकि उसने पांडवो को पहचान लिया है तो पांडवो को पूर्व शर्त अनुसार फिर से बारह वर्ष वन में जाना चाहिए। दूत अपनी ओर से एक बात जोड देते है। वह कहते है कि युधिष्ठिर की ओर से वे वचन देते है कि यदि भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य अथवा विदूर उन में से एक भी कह दे कि अर्जुन और दुर्योधन का युद्ध में सामना होने से पहले अज्ञातवास समाप्त नहीं हुआ था तो युधिष्ठिर फिर से वन में चले जाएंगे। इस पर कृपाचार्य को पूछा जाने पर वह कहते है कि चंद्र और सौर दोनों की गणना से यह साबित होता है कि अज्ञातवास समाप्त हो गया था। किन्तु दुर्योधन कृपाचार्य का अपमान करते हुए कहता कि गणित कुछ भी कहता हो, वह कहता है कि अज्ञातवास समाप्त नहीं हुआ था। अर्थात् जिस प्रकार भारत ने इतने वर्षो में आतंकवादी प्रवृत्ति, विशेष रूप से २००८ के मुंबई हमले, १९९३ बम्ब धमाके, पठाणकोट हमले आदि में दस्तावेजी प्रमाण दिये फिर भी वह किसी ना किसी रूप से आतंकवादी लोगों के विरुद्ध कारवाई टालता ही रहा है। ताजा स्थिति यह है कि उस ने एफएटीएफ की कारवाई से बचने के लिए सूचि में से ४,००० आतंकवादीओ के नाम हटा दिये है। इस प्रकार महाभारत के जैसे ही भारत और पाकिस्तान में अंतिम और भीषण लडाई होना निश्चित है।

इस से पहले भीष्म- विदूर सभी धृतराष्ट्र को एकांत में समजाते है कि वह इन्द्रप्रस्थ पांडवो को लौटा दे (वैसे तो पूरे हस्तिनापुर पर उनका अधिकार था किन्तु समाधान के अनुसार, इन्द्रप्रस्थ दिया गया था इस लिए इन्द्रप्रस्थ) किन्तु धृतराष्ट्र बहाना करता है कि वह अपना निर्णय बाद में कहलवायेगा। अतः वह खाली हाथ राजपुरोहित को लौटा देते है।

सारथि संजय धृतराष्ट्र की ओर से शांति प्रस्ताव देते हुए

धृतराष्ट्र अपने सारथि संजय को दूत बनाकर भेजते है। इस से पहेले दोनों की बातचीत में यह जानने को मिलता है कि धृतराष्ट्र जानते है कि मत्स्य देश के युद्ध में अकेले अर्जुन ने भीष्म आदि कौरव सेना को परास्त किया था। इस लिए युद्ध उनके हित में नहीं है। फिर भी उनका प्रस्ताव यह है कि पांडव जहां है वहां पर उसी स्थिति में आनंदित रहे। यहां पर इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि धृतराष्ट्र को विदूर, भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, संजय, पत्नी गांधारी आदि सभी सही बात समजानेवाले थे। लेकिन अपनी दबी हुई महत्त्वाकांक्षा को वह दुर्योधन की महत्त्वाकांक्षा में साकार होते देखते है। उन को तो पांडु ने अपने शाप के कारण राजा बनाया था। तो कदाचित वह चाहते होंगे कि अब दुर्योधन को किसी कृपा के कारण नहीं, अपने बलबूते पर सत्ता मिलें। संजय कहते है कि उन्हों ने कौरव और पांडव दोनो को बचपन में खिलाया है। इस लिए किसी भी पक्ष में शव गिरें तो उन्हें बहोत दुःख होगा। इस का भी कदाचित अर्जुन पर असर पडा हो। संजय का प्रस्ताव स्वाभाविक पांडवो अर्थात उनकी ओर से निर्णय लेनेवाले युधिष्ठिर को स्वीकार्य नहीं था। संजय पहले धृतराष्ट्र को अकेले आकर सभी बात कहते है। इस में एक बहोत ही महत्त्वपूर्ण विधान वह कहते है। वह कहते है कि देर से बोले जानेवाला सत्य, असत्य से अधिक हानिकारक होता है। किन्तु औपचारिकता के कारण दूसरे दिन राज्यसभा में वो सभी बात कहते है जो मत्स्य देश में पांडवो के साथ हुई थी। वहां अर्जुन ने दुर्योधन को और कर्ण को मारने की बात की थी। इस पर धृतराष्ट्र पूछते है कि उसे किसी ने रोका नहीं। तो संजय कहते है कि नहीं। इस का अर्थ यह कि अर्जुन ने जो कहा उसे युधिष्ठिर का मौन समर्थन था। हम देशों के बीच भी ऐसी स्थिति देखते है और दलों के बीच भी ऐसी स्थिति देखते है जहां पर उत्तेजनावाली बात संरक्षण मंत्री, विदेश मंत्री, सेनाध्यक्ष आदि करते है किन्तु प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति ज्यादातर ऐसी बातें नहीं करते। राजनैतिक दलों में भी जो दूसरी श्रेणी के लोग होते है जैसे कि दिग्विजयसिंह, मनीष तिवारी, ओवैसी का भाई, आझम खान, साक्षी महाराज आदि ऐसे उत्तेजित करनेवाले निवेदन करते है। दल के अध्यक्ष और प्रमुख नेता मौन रहेते है।

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