उत्तर रामायण का यह एपिसॉड प्रत्येक बच्चों को दिखाने लायक

उत्तर रामायण का यह एपिसॉड प्रत्येक बच्चों को दिखाने लायक

by Jaywant Pandya

आज उत्तर रामायण में जो प्रकरण आया वह प्रत्येक बच्चों को दिखाना चाहिए और प्रत्येक भारतीय को देखना चाहिए। गुरुकूल में और हिन्दू धर्म में वास्तव में क्या शिक्षा दी जाती थी और दी जाती है वह सुंदर रूप से दिखाया। वाल्मीकिजी ने सीताजी का नाम वनदेवी रखा था क्योंकि उनका वास्तविक परिचय सब को पता न चलें। वनदेवी लव-कुश के साथ वन में सूखी लकडियां इकट्ठी करने गई थीं। किन्तु भूल से लव-कुश में से एक ने हरे वृक्ष को काटना शुरू कर दिया। तुरंत वनदेवी अर्थात् सीताजीने उसे समजाया कि प्रकृति हमारी माता है। हरे भरे पेड को काटना नहीं चाहिए। हमें जितना चाहिए उतना ही लेना चाहिए। सूखी लकडियां ही लेनी चाहिए। अर्थात् बच्चों का वास्तविक शिक्षण बचपन से ही शुरू होता है और वह जब वाल्मीकिजी जैसे के आश्रम में हो तो तो क्या कहना।

आगे चल कर लव-कुश को सीताजी संध्या वंदन के लिए नदी किनारे भेजती हैं। उस समय सांप आता है। किन्तु चूं कि यह आश्रम है और सात्विकता से ओतप्रोत है। इस लिए वह हिंसक नहीं है। किन्तु वाल्मीकिजी को ध्यान में अंतःस्फूरणा हो जाती है। अब यहां प्रश्न यह उठता है कि ऐसा हो सकता है क्या? तो इस का उत्तर यह है कि प्रत्येक मानव में आज्ञाचक्र और सुपर पावर थोडे बहोत अंश में होती है। जिस की जितनी शक्ति जागृत उस को उतनी ज्यादा अंतःस्फूरणा होती है। कोई पूर्व जन्म का योगी हो तो इस जन्म में साधना करनी आवश्यक नहीं है। एक उदाहरण दूं। आप मोबाइल से इतने झूडे रहते है। आप का लगाव इतना हो गया है कि आप बैठे हैं, आप के पास मोबाइल रखा हुआ है, आप टीवी देख रहे हैं, आप का ध्यान पूरा टीवी में है, किन्तु मोबाइल में रिंग बजे उस से पहले आप का ध्यान वहां चला जाता है। यह बात आप को पता कैसे चल गई? क्योंकि आप का लगाव इतना अधिक हो गया है। तो वाल्मीकिजी को पता चलता है कि वहां सांप है और वह लव-कुश को कुछ नहीं करनेवाला। परंतु लव-कुश डर न जाए इस लिए वह शिष्य को आदेश करते है कि वह सांप को आदेश करे कि वह किसी ओर वृक्ष पर रहने चला जाए। शिष्य जाता है और नागराज को आदेश सूनाता है किन्तु तभी केवल दो-तीन वर्ष के लव-कुश कहते है कि वे नागराज से नहीं डरते। और यह उनका निवासस्थान है। तो उसे बदलने को न कहिए।

यही है हिन्दू धर्म। जहां वृक्ष और नाग जैसे हिंसक प्राणी का भी ध्यान रखा जाता है।

इस के पश्चात् वाल्मीकिजी द्वारा लव-कुश का उपनयन संस्कार होता है। मंत्रदीक्षा होती है। वाल्मीकिजी लव-कुश को वृक्ष के पास ले जाते है। वहां उन को नमन कराते है। इस प्रकार नदी, गायों के पास ले जाते है। निम्न श्लोक गाया जाता है।

*परोपकाराय फलन्ति वृक्षा:, परोपकाराय वहन्ति नद्य:।*

*परोपकाराय दुहन्ति गाव:, परोपकाराय मिदं शरीरम्॥*

वृक्ष परोपकार के लिए ही फलते हैं। नदी परोपकार के लिए ही बहती है। गाय परोपकार के लिए दूध देती है। इसी प्रकार इस शरीर की सार्थकता परोपकार में ही है।

ऐसी शिक्षा यदि ऐ.सी. कमरे में दी जाए तो व्यर्थ हो जाती है, किन्तु प्रकृति के समीप दी जाए तो असरकारक रहती है। आप याद कीजिए कि आप जब घूमने जाते है तो आप घूमने के लिए अधिकतर कौन सा स्थान पसंद करते है? हिल स्टेशन, समुद्र किनारे, वन वाले विस्तार। जहां आप प्रकृति के समीप रहते है। वहां आप प्रफुल्लित हो जाते है। क्योंकि प्रकृति हंमेशां सुख देती है। प्रकृति में असंतुलन हो जाता है तभी वह रौद्र रूप धारण करती है।

फिर लव-कुश को गायन-वादन आदि संगीत की शिक्षा भी दी जाती है। धनुष और मल्लविद्या भी सिखाई जाती है। एक-दो महीने पहेले भारतीय विचार मंच द्वारा आयोजित एक संगोष्ठि में मैंने साबरमती गुरुकूल के छोटे-छोटे बच्चों द्वारा बडी संख्याओं का गुणाकार, जोड, आदि फटाक से वैदिक गणित द्वारा करना देखा था। उनके द्वारा कविता, श्लोक रचना, नाट्य, वादन, मलखम पर दांव का प्रदर्शन दिखाया गया तब सभी मंत्रमुग्ध हो गये थे। किन्तु मैकोले ने जो शिक्षा प्रणालि दाखिल की उस में सर्व प्रथम मूल भाषा संस्कृत का विलोप किया गया। भारत स्वतंत्र हुआ इस के पश्चात भी मैकोले की यही शिक्षा प्रणालि चालु रखी गई। आज तो अंग्रेजी ओर अधिक हावी हो गई है। फिर से समय है और अधिक गुरुकुल बने, फूले-फाले।

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