अप्रिय सत्य बोलना तलगाजरडा के अनुभव में सत्यापराध है : मोरारी बापु

अप्रिय सत्य बोलना तलगाजरडा के अनुभव में सत्यापराध है : मोरारी बापु

by Jaywant Pandya
(लिखा दि.१७  जून २०२० को)
Sangeetniduniya is feeling positive एसा फेसबुक पर लिख के नीचे दी गई लिंक पर नव फरवरी २०२० सायं ६ बजे संगीतनी दुनिया फेसबुक पेज पर अपलॉड किया गया

क्या आपसे कोई अपराध हुआ है , ओर उन अपराधों से मुक्ति चाहते है

Posted by "Sangeetniduniya" on Sunday, February 9, 2020

जिस में मोरारीबापु कहते है
“अप्रिय सत्य बोलना तलगाजरडा के अनुभव में सत्यापराध है।
सत्य कटु हो ही नहीं सकता। हम सत्य को कटु करते है। शायद अपने सत्य को… क्योंकि लोग समज बैठे है कि कडवा बोला तो ही सत्य बोला एसा माना जाएगा। हमारे सत्य को सिद्ध करने के लिए उसको कटु बनाया जाता है। सत्यं  ब्रुयात् प्रियं ब्रुयात्। भगवद् गीता भी कहती है, तू सत्य बोल, प्रिय बोल, हितकारी बोल।
अधिकार नहीं है हमें सत्य मुंह चिढाकर बोलने का। मुस्कुराकर बोलो। सत्यनारायण प्रसन्न होगा। एक सीधी बात। सत्य को अप्रिय करना सत्य का अपराध है।
दूसरी बात। दूसरे के सत्य का स्वीकार नहीं करना यह सत्य का अपराध है। तुम मेरी बात कुबूल न करो तो मोरारीबापु का अपराध नहीं है। मोरारीबापु ने जो सत्य कहा वह सत्य का अपराध है… यदि वह सत्य है तो।… किसी का सत्य है तो कम से कम कुबूल तो करो, स्वीकार तो करो।
और तीसरा। मैं सत्यवादी हूं इस अहंकार सत्य का अपराध है। सत्य को पुष्ट करने के लिए अहंकार की क्या जरूरत है, हं? नाश्वंत तत्व को सत्य के सपॉर्ट में रखने की कोई जरूरत नहींआ  है। सत्य अजर अमर है। और अहंकार दीर्घजीवी नहीं है।
गीतों में सब होता है वह हकीकत नहीं होती है। कल्पना होती है। कल्पना में भी जिया जा सकता है।
(प्रेम की बात प्रासंगिक नहीं इस लिए उसका उल्लेख नहीं करता)
करुणा में किसी का पक्षपात करना यह करुणा का अपराध है। अपने पराये का बोध नहीं होता करुणा में। (मोरारीबापु के चहिते लोग सनातन को छोड मोरारीबापु का ही पक्षपात करते है।) जिसने हमें करुणा की संपत्ति दी हो एसे करुणासागर को भूल जाना।” (जैसा मोरारीबापुने उपरोक्त लिंक वाले विडियो में बोला वैसा ही)
प्रश्न यह है कि मोरारीबापु, आप अपनी ही पुरानी कथा सूनते है, अथवा उस में क्या कहा था यह स्मरण में रखते है? यदि रखते तो श्री कृष्ण के विषय में ‘फेइल’ ‘टोटली फेइल’ एसा नहीं तुच्छकार-धिक्कार के साथ नहीं कहते। यादवास्थली सत्य है किन्तु उस के विषय में आपने जिस प्रकार प्रस्तुती की वह अप्रिय सत्य था और वह आप का पहला अपराध था। आपने श्री कृष्ण के भक्तजनो और श्रद्धालुओ की भावना नहीं समजी वह दूसरा अपराध था। आप ही सत्यवादी है एसा आप के चहीते-साहित्यकार-कलाकार ने प्रचारित किया यह आप की छावनी से सत्य का तीसरा अपराध था। किन्तु यह अपराध पहली बार नहीं हुआ है। आप व्यास पीठ पर से श्री राम, देवो के देव महादेव शिवजी, श्री कृष्ण की स्तुति में आदि शंकराचार्य, वल्लभाचार्य, नरसिंह महेता, मीराबाई आदि संतो द्वारा रचित कीर्तन के स्थान पर अली मौला, या हुसैन आदि करते है इस लिए अनेक हिन्दू-सनातनी श्रद्धालुओं का दिल दुःखा है। आप के कई विडियो इस विषय में प्रचलित हुए है। जिस में आप कथा के पैसों से विधर्मीओ की पाठशाला बनाने का भी कह रहे है। एक में आप कह रहे है कि अली मौला आप के अंदर के आप को प्रेरित करता है यह संकीर्तन गवाने को। मैंने इस विषय में गुजराती में पहले लिखा है इस लिए अधिक नहीं लिखूंगा। आप की देखादेखी में जो बिलाडी के टोप (हमारे गुजराती में एसा ही कहा जाता है) की तरफ उग निकले कथाकार तो आप से कई कदम आगे बढ गए है, दारू जैसे गीतो को गाना, इस्लाम की वाहवाही करना। इस लिए आप का अपराध और भी बढ जाता है क्योंकि गीता में श्री कृष्ण कहते है:
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।३.२१।।
अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही अनुकरण करते हैं; वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है, लोग भी उसका अनुसरण करते हैं।। मोरारी बापु का अपराध इस लिए भी गंभीर है क्योंकि लाखों करोडो भक्त और हिन्दू धर्म में श्रद्धा रखनेवाले अथवा इस की ओर आकर्षित होनेवालों के लिए उनका शब्द धर्मग्रंथ से भी महान है। आज की पीढी धर्मग्रंथ से अधिक विडियो देखती है। भविष्य में मोरारी बापु के एसे विडियो हिन्दूओं को भ्रमित करनेवाले हो सकते है।
वैसे तो तलगाजरडा में त्रिभुवन वट की छाया में आप के द्वारा क्षमा याचना से यह विवाद समाप्त हो जाना चाहिए था, किन्तु आप की छावनी से, संगीतनी दुनिया फेसबुक पेज पर प्रतिदिन कलाकार, कथाकार, साधु-संत-महंत के आप के पक्ष में विचार रखे गए।  आप के चहीते-आप को माननेवाले और आप के पक्षधर कुछ कथाकार जिन को भय हो सकता है कि कल हमारे सामने भी विवाद हो सकता है, उन्हों ने कहा कि आप की आलोचना नहीं हो सकती? क्यों भला? सनातन में तो प्रश्न पूछने का क्रम नचिकेता से चला आ रहा है और अर्जुन-श्री कृष्ण के संवाद में से ही तो भगवद् गीता का जन्म हुआ था। सनातन में कोई पोप या ईमाम जैसी प्रणालि नहीं जिस को कोई प्रश्न न पूछा जा सके। जिस की आलोचना न हो सके। सनातन की ये ही तो विशेषता है कि जब सनातन में कोई भ्रष्ट आचरण धर्म क्षेत्र में होता है तो उस के विरुद्ध सनातनी ही उठ खडे होते है। मोरारी बापु को समजना होगा कि उनके आसपास जो वामपंथी टोली है वह उनका और सनातन का हित चाहनेवाली नहीं है, वह भ्रमित करनेवाली ही है।
आज हिन्दू समाज आक्रोशित है, किन्तु केवल मोरारी बापु ही नहीं, समुचे भारतीय समाज को समजना होगा कि चाहे वह धर्म क्षेत्र हो, कथा का क्षेत्र हो, फिल्में हो, चित्र हो, वेब सीरिझ हो, अनेक रूप से हिन्दू-सनातन की श्रद्धा को ठेस पहोंचाने के प्रयास बढ गये है। हिन्दू समाज सहिष्णु है किन्तु कायर नहीं है। शब्द से, चित्र से, फिल्म से, वेब सीरिझ से जो होता है वह हिंसा ही है। किन्तु इस का उत्तर भी उसी प्रकार से अर्थात्- शब्द का शब्द से, चित्र का चित्र से, फिल्म का फिल्म से, अथवा तो अधिक से अधिक – लोकतांत्रिक रूप से विरोध-आंदोलन एसा करना चाहिए। इस लिए हिन्दू विरोधीओ को समज लेना होगा कि अब पानी गले तक पहोंच गया है। आप हिन्दू समाज की सहनशीलता की कसोटी न करे। हिन्दू समाज भी अपना धैर्य न गंवाते हुए लोकतांत्रिक रूप से ही उत्तर दे।
इस विषय पर गुजराती में मेरी पूर्व पॉस्ट इस लिंक पर पढिए
www.jaywantpandya.com/moraribapu-sadhu-must-be-bold-and-courageous-to-tell-truth/

(अपडेट: जब  आदरणीय बापु द्वारिकाधीश के दर्शन के बाद मिडिया के सामने क्षमायाचना कर रहे थे तब श्री कृष्ण के विषय में  मोरारी बापु द्वारा बोले गये शब्दो से आहत और विचलित दिखनेवाले पूर्व विधायक पबुभा माणेक आवेश में मोरारी बापु के पास जा रहे थे कि उनको भाजप के ही सांसद पूनम माडम और अन्य द्वारा रोक लिया गया। यह घटना दु:खद है। )

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