सडे हुए गेहूं और निम्न गुणवत्ता के पीपीई

सडे हुए गेहूं और निम्न गुणवत्ता के पीपीई

by Jaywant Pandya

अमरिका ने भारत को सड़े-गले गेंहूं निर्यात किये तो चीन ने निम्न गुणवत्ता के पीपीई दान में दियें।इस घई

स्वतंत्रता के समय नहेरु जब अमरिका गेंहु के लिए गये थे तब अमरिका ने ब्युरोक्रसी की दृष्टि से काफी अड़चनें डाली थी। इस के बाद जब इन्दिरा गांधी अभी प्रधानमंत्री बनी ही थी तब खाद्य अभाव के कारण उनको अमरिका के पास याचना करनी पडी थी जो कि देश की दृष्टि से बहोत दुःखदायक बात थी। उस से पहले वियेतनाम के दो नगर पर बम्ब फैंकने के लिए संयुक्त राष्ट्रो के प्रकार भारत ने अमरिका की आलोचना की थी। इस कारण अमरिका ने प्रतिशोध लेते हुऐ सड़े-गले गेंहु भेजे थे। इस निर्णय के कारण इन्दिराजी की भारत में बहोत आलोचना हुई थी।

लेकिन कई बातों में अमरिका ने भारत की मदद भी करनी चाही। लेकिन सोवियेत संघ और साम्यवाद के प्रभाव में हमनें अमरिका की सदा उपेक्षा की। वह चाहे मिडिया हो या प्राध्यापक, फिल्में हो या कला के कोई भी क्षेत्र, सभी स्थानों पर साम्यवादीओं का जोर था। आज भी है।

किन्तु उदारीकरण के बाद भारत में एक बडा वर्ग, वह चाहे फिल्में हो या मिडिया, अमरिका के उपभोक्तावाद का महिमामंडन किया गया। लॉन, क्रेडिट कार्ड की बोलबाला बढ़ी। उनके डॅ जो बहुराष्ट्रीयकंपनीओं द्वारा बनाये गये या हडप कर लिये गये (जैसे माता दिवस) वह भारत में मिडिया, फिल्म और टीवी के माध्यम से थोपे जाने लगे, जैसे फैशन शॉ, वेलेन्टाइन दिन इत्यादि। अभी हेलोवीन को थोपने के प्रयास चल रहे है।

आज कोरोना युग में फिर से स्थिति करवट ली रही है। चीन में कोरोना उद्भव होने कारण और अपनी स्थिति पर पडदा डालने के कारण और जो हलकी गुणवत्ता के सुरक्षात्मक चिकित्सा साधन भेजें है इस लिए चीन के प्रति रोष बहोत है। दुनियाभर में है। किन्तु एक पक्ष यह भी है कि चीन के विरुद्ध व्यापार युद्ध की शुरुआत अमरिका ने की थी। एक समय संस्थान बना कर अलग-अलग देशों की जनता और उनके आर्थिक संसाधनो को बर्बरता से लूटने का काम युरोप के देशों ने, और उनकी जनता से बने अमरिका ने किया था।

इतिहास में देखें तो भारत और चीन के संबंध कभी खराब नहीं रहे सिवाय १९६२ का वह युद्ध। वह भी हमनें तिबेट हथिया जाने पर उनके लोगों को आश्रय दिया, बाद में हुआ। एक युद्ध राजा हर्षवर्धन के मृत्यु के बाद हुआ था। अर्जुन जा़ नामक राजा ने चीन के दूत वांग शुआन्स और उसके ३० निम्न कर्मचारियों पर हमला किया था। ये हमला क्यों किया था यह कारण जानने को नहीं मिला है। उस समय वांग भाग के तिबेट गये थे और बाद में नेपाल और तिबेट के सैन्य के साथ चीन ने हल्ला बोला था। और वह सफल हुए थे। लेकिन यह चीन और तिबेट के दस्तावेज के अनुसार है। भारत की दृष्टि से मेरे पास जानकारी नहीं है।

बदलते समय में हमें वह भूल नहीं करनी चाहिए जो नेहरु और इन्दिराजी ने की थी। अर्थात् अपने से बलवान चीन और अमरिका की दुश्मनी। हमारे द्वारा अमरिका की उपेक्षा के कारण अमरिका पाकिस्तान की ओर चला गया। इसके कारण आतंकवाद पनपा और कितने वर्षों तक और आज भी हमें दुष्परिणाम भुतने पडे अथवा पड रहे है।

इस लिए आनेवाले समय में हमें चीन और अमरिका के साथ संबंध में बहोत सावधानी बरतनी होगी। संतुलन रखना होगा जैसे कि मोदी सरकार रखती आ रही है।

वैसे चीन के अमरिका में राजदूत रहे हु शिह ने कहा था कि भारत ने अपने एक भी सैनिक को सीमा पार भेजे बगैर सांस्कृतिक रूप से चीन पर विजय पाया और बीस सदी तक वर्चस्व रखा।

आज फिर वह भारत को जगाने का समय है और संस्कृति की आयात के स्थान पर निर्यात की आवश्यकता है।

स्वतंत्रता के समय नहेरु जब अमरिका गेंहु के लिए गये थे तब अमरिका ने ब्युरोक्रसी की दृष्टि से काफी अड़चनें डाली थी। इस के बाद जब इन्दिरा गांधी अभी प्रधानमंत्री बनी ही थी तब खाद्य अभाव के कारण उनको अमरिका के पास याचना करनी पडी थी जो कि देश की दृष्टि से बहोत दुःखदायक बात थी। उस से पहले वियेतनाम के दो नगर पर बम्ब फैंकने के लिए संयुक्त राष्ट्रो के प्रकार भारत ने अमरिका की आलोचना की थी। इस कारण अमरिका ने प्रतिशोध लेते हुऐ सड़े-गले गेंहु भेजे थे। इस निर्णय के कारण इन्दिराजी की भारत में बहोत आलोचना हुई थी।

लेकिन कई बातों में अमरिका ने भारत की मदद भी करनी चाही। लेकिन सोवियेत संघ और साम्यवाद के प्रभाव में हमनें अमरिका की सदा उपेक्षा की। वह चाहे मिडिया हो या प्राध्यापक, फिल्में हो या कला के कोई भी क्षेत्र, सभी स्थानों पर साम्यवादीओं का जोर था। आज भी है।

किन्तु उदारीकरण के बाद भारत में एक बडा वर्ग, वह चाहे फिल्में हो या मिडिया, अमरिका के उपभोक्तावाद का महिमामंडन किया गया। लॉन, क्रेडिट कार्ड की बोलबाला बढ़ी। उनके डॅ जो बहुराष्ट्रीयकंपनीओं द्वारा बनाये गये या हडप कर लिये गये (जैसे माता दिवस) वह भारत में मिडिया, फिल्म और टीवी के माध्यम से थोपे जाने लगे, जैसे फैशन शॉ, वेलेन्टाइन दिन इत्यादि। अभी हेलोवीन को थोपने के प्रयास चल रहे है।

आज कोरोना युग में फिर से स्थिति करवट ली रही है। चीन में कोरोना उद्भव होने कारण और अपनी स्थिति पर पडदा डालने के कारण और जो निम्न गुणवत्ता के सुरक्षात्मक चिकित्सा साधन (पीपीई) भेजें है इस लिए चीन के प्रति रोष बहोत है। दुनियाभर में है। किन्तु एक पक्ष यह भी है कि चीन के विरुद्ध व्यापार युद्ध की शुरुआत अमरिका ने की थी। एक समय संस्थान बना कर अलग-अलग देशों की जनता और उनके आर्थिक संसाधनो को बर्बरता से लूटने का काम युरोप के देशों ने, और उनकी जनता से बने अमरिका ने किया था।

इतिहास में देखें तो भारत और चीन के संबंध कभी खराब नहीं रहे सिवाय १९६२ का वह युद्ध। वह भी हमनें तिबेट हथिया जाने पर उनके लोगों को आश्रय दिया, बाद में हुआ। एक युद्ध राजा हर्षवर्धन के मृत्यु के बाद हुआ था। अर्जुन जा़ नामक राजा ने चीन के दूत वांग शुआन्स और उसके ३० निम्न कर्मचारियों पर हमला किया था। ये हमला क्यों किया था यह कारण जानने को नहीं मिला है। उस समय वांग भाग के तिबेट गये थे और बाद में नेपाल और तिबेट के सैन्य के साथ चीन ने हल्ला बोला था। और वह सफल हुए थे। लेकिन यह चीन और तिबेट के दस्तावेज के अनुसार है। भारत की दृष्टि से मेरे पास जानकारी नहीं है।

बदलते समय में हमें वह भूल नहीं करनी चाहिए जो नेहरु और इन्दिराजी ने की थी। अर्थात् अपने से बलवान चीन और अमरिका की दुश्मनी। हमारे द्वारा अमरिका की उपेक्षा के कारण अमरिका पाकिस्तान की ओर चला गया। इसके कारण आतंकवाद पनपा और कितने वर्षों तक और आज भी हमें दुष्परिणाम भुतने पडे अथवा पड रहे है।

इस लिए आनेवाले समय में हमें चीन और अमरिका के साथ संबंध में बहोत सावधानी बरतनी होगी। संतुलन रखना होगा जैसे कि मोदी सरकार रखती आ रही है।

वैसे चीन के अमरिका में राजदूत रहे हु शिह ने कहा था कि भारत ने अपने एक भी सैनिक को सीमा पार भेजे बगैर सांस्कृतिक रूप से चीन पर विजय पाया और बीस सदी तक वर्चस्व रखा।

आज फिर वह भारत को जगाने का समय है और संस्कृति की आयात के स्थान पर निर्यात की आवश्यकता है।

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