सत्तारुढ व्यक्ति के खाते में पुत्र के अत्याचार भी जमा होते है

सत्तारुढ व्यक्ति के खाते में पुत्र के अत्याचार भी जमा होते है

by Jaywant Pandya
महाभारत की कहानी, वही भारत की कहानी, लेखांक-७
आज (२५ अप्रैल २०२०) के दो एपिसॉड में क्या कहानी आई?
द्रौपदी वस्त्राहरण की दुर्घटना का पुनरावर्तन हुआ। मत्स्य देश (अर्थात् राज्य में क्योंकि उस समय अपनी मातृभूमि को देश कहा जाता था। मुंबई में जो गुजराती बसे हुए है उनमें पुरानी पीढी आज भी मातृभूमि के गुजरात के शहर आना हो तो एसा ही कहती है कि देश जाना है।) में राजा विराट के यहां दासी बनी सैरंध्री अर्थात द्रौपदी को राजा के साले और सेनापति किंचक का कथा में प्रवेस हुआ। और उसने आत्महत्या की धमकी देकर अपनी बहन और महारानी से उस की दासी सैरंध्री को उस के कक्ष में भेजने को कहा। इस से पहले सैरंध्री अर्थात् द्रौपदी जान चूकी थी कि किंचक उस के प्रति दुष्ट आशय रखता है। इस लिए वह जाने से संकोच करती थी। किन्तु महारानी ग्लानिमय वदन से उसको जाने को कहती है। अतः वह जाती है और किंचक उस की छेडखानी करता है। द्रौपदी अपने को छुडाकर राज्यसभा की ओर भागती है तो वहां पर भी राजा और सामंतो के सामने किंचक द्रौपदी की छेडखानी करता है। वहां पर युधिष्ठिर भी कंक नाम से वेश बदलकर उपस्थित है। वह चूपचाप देखता है। अंत में द्रौपदी हस्तिनापुर की घटना का पुनरावर्तन कर के राजा से प्रश्न करती है। वह कंक की ओर देखकर भी प्रश्न करती है। कंक उसे अपमान के कडवे घूंट चूपचाप पी जाने को कहते है।
अर्थात् फिर से धर्मराज युधिष्ठिर का अधर्म के प्रति मौन रहेना अथवा जिस के साथ अन्याय हुआ है उस को ही चूप रहेने को कहते है। संभवतः उन को डर है कि यदि किंचक को मारा जाएगा तो कौरवों को पता चल जाएगा और उन लोगों को फिर से १२ वर्ष वन में रहना पडेगा। किन्तु इस का उत्तर यह भी तो हो सकता है कि अज्ञातवास समाप्त होने को आया है और तभी द्रौपदी का एक बार फिर से बलात्कार (आज की भाषा में)। वह कैसे सह लिया जाए। वह भी पांच पांच बलशाली पति होते हुए। और पकडे गये तो क्या हुआ। कौरवों ने कौन सी नीति मानी है तो पांडव माने? युधिष्ठिर ने भीम को भी रोक लिया था।
किन्तु इस बार द्रौपदी कहां माननेवाली थी? भीम को जगाकर उसे उत्तेजित करती है। भीम उपाय दिखाते है कि रात में नृत्यशाला में बुलाओ। और रात में भीम किंचक का वध कर देते है। इस का पता दुर्योधन को चलता है तो वह जान लेता है कि यह काम केवल और केवल भीम ही कर सकता है। अतः वह अब मत्स्य देश पर हमले की सोचता है। उसे लगता है कि चूं कि पांडवोने वहां का अन्न खाया है तो वह बचाने आयेंगे ही। इस तरह उन को पहचान कर फिर से १२ वर्ष वनवास में भेजा जा सेकगा। किन्तु इस के लिए कोई सात्विक कारण से ढंका हुआ बहाना चाहिए। शकुनि कहेता है कि तुम महाराज धृतराष्ट्र से भी अर्धसत्य बोलना। नहीं तो भीष्म अथवा विदूर रोक लेंगे। किन्तु अब दुर्योधन को पक्का विश्वास है कि अब कौई कुछ नहीं बोलेगा (यह बात अपने इस श्रेणी के लेखांको में मैं पहले ही लिख चूका हूं कि वस्त्राहरण के प्रकरण के बाद दुर्योधन का दुःसाहस आकाश में उडने लगा था) क्योंकि भीष्म, द्रौण, कृपाचार्य और विदूर सब अपने कर्तव्य और निष्ठा से बंधे हुए है और वे राजा को ही ईश्वर समजते है। अर्थात् उन में राजा के अनैतिक निर्णय के विरोध करने का साहस नहीं रहा था। अतः पहेले दुर्योधन के प्रस्ताव सूने बिना ही उनका विरोध करने के पश्चात भीष्म मान जाते है।
यहां बार बार यह दिखता है कि भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा का अर्धघटन कितना मिथ्या किया था? उन्हों ने हस्तिनापुर की रक्षा का प्रण लिया था। किन्तु हस्तिनापुर के विनाश का नहीं। अतः उनको वह प्रत्येक कार्य को रोकने का अधिकार उसी प्रतिज्ञा के अंतर्गत था जिस के कारण हस्तिनापुर विनाश की ओर जाता दिखता था। वे यह भी मिथ्या ही सोचते थे कि दुर्योधन को बलपूर्वक उन्हें रोकना नहीं चाहिए। क्योंकि दुर्योधन महाराज नहीं था। वह केवल युवराज था। तो भीष्म द्युत क्रीडा समय ही दुर्योधन को रोक सकते थे। क्योंकि उन्हों ने महाराजा का आदेश मानने, उन की रक्षा करने का प्रण लिया था। यह फिर से दर्शाता है कि सात्विक होना अथवा किसी अच्छे आशय से प्रतिज्ञा लेना ही अच्छी बात नहीं। अपने आप को महान बनाने के लिए प्रतिज्ञा के साथ जडता से बंधे रहना भी मूर्खता और अहित करनेवाली बात है। गांधीजीने भी अपनी एसे कुछ सिद्धांतो को थोप कर और इसी सिद्धांत के आड में बहोत सारे अन्याय (जिस की बात मैं फिर से नहीं लिखूंगा) होने दिये। इस से भारत का अहित ही हुआ।
दूसरा, पुत्र मोह का परिणाम क्या आता है? धृतराष्ट्र के पुत्र मोह के कारण उस का पुत्र सुपर किंग बन जाता है। आज के एपिसोड में दिखाया गया कि वह कहता है कि महाराजा उस की मुठ्ठी में है। तो पुत्र मोह के कारण यदि आप सत्ता में हो और आप अपने पुत्र को मोह के कारण छूट दे दो तो आप को (धृतराष्ट्र को) वो ही कुख्याति मिल सकती है जो वह कदाचित खभी नहीं करते। और अंत में कुल नाश की ओर सारी बात चली जाती है। ईन्दिरा गांधी के साथ भी तो यही हुआ। सत्ता बचाने के लिए आपातकाल लागु किया। और इस दौरान संजय गांधी इतने सुपर पीएम हो गये कि उनके खातें के अत्याचार इन्दिराजी के खाते में जमा हो गये। पुलित्झर पुरस्कार विजेता पत्रकार लुईस एम. सिमोन्स जो दिल्ली में वॉशिंग्टन पॉस्ट के संवाददाता थे, उन्हों ने लिखा था कि एक रात्रि भोज में संजय गांधी ने अपनी माता ईन्दिरा को छह बार थप्पड मार दिये थे। सोचिए तो। सब के सामने संजय अपनी माता के प्रति एसे हो सकते है तो सामान्य जनता का क्या महत्त्व?
यहां पर एक ओर साम्यता दिखती है। दुर्योधन ने जिस प्रकार पांडव अज्ञातवास में कहा गये इस की गुप्तचर द्वारा जांच कराई किन्तु उस को सफलता नहीं मिली। इस प्रकार जवाहरलाल नेहरु ने अपने हरीफ जिन को गांधीजी ने राजनैतिक दांवपेच से कॉंग्रेस से निकल जाने पर विवश किया था, उस सुभाषचंद्र बोझ के मृत्यु का समाचार मिलने के बाद भी उनके परिवार की २० वर्ष तक जासूसी करवाई थी।
www.indiatoday.in/india/north/story/nehru-snoop-subhash-chandra-bose-family-members-spy-exclusive-248189-2015-04-12
(यहां मैं फिर से स्पष्टता कर दूं कि यह केवल साम्यता दिखा रहा हूं, नेहरु को दुर्योधन कहेने का मेरा कोई अर्थ नहीं है)
आज के एपिसोड में कर्ण और द्रौण संवाद भी हिन्दू समाज के विषय में जो अपप्रचार होता है उस का खंडन करता है। कर्ण द्रौण से प्रश्न करता है कि क्या सभी जाति का शिक्षा पर अधिकार नहीं है? यदि है तो आप ने मुझे शिक्षा देने से अस्वीकार क्यों कर दिया था? द्रौण कहते है कि एसा नहीं है। सभी जातिओं का अधिकार है किन्तु मेरा दायरा केवल राजकुमारो को शिक्षा देने तक था। अर्थात् द्रौण गुरुकुल नहीं चलाते थे। वे प्राइवेट ट्यूटर जैसे थे। इसी समय में सांदीपनी आश्रम में श्री कृष्ण जैसे राजकुमार के साथ अकिंचन सुदामा भी पढाई करे, दोनों की मित्रता भी हो, इस का अर्थ यह है कि जातिओं के लिए शिक्षा के संदर्भ में कोई भेदभाव नहीं था। द्रुपद और द्रौण भी तो विद्यार्थी काल में मित्र थे।
और कर्ण असत्य बोल के परशुराम के पास शिक्षा लेते है किन्तु उस की गोद में जब गुरुवर सो रहे होते है तब एक कीडा काटता है और गुरु की निद्रा में विघ्न न हो इस लिए वह कीडे का दंस सहन कर लेते है। तब परशुराम जाग जाते है और कहते है कि इतनी सहनशक्ति केवल क्षत्रिय में ही हो सकती है। और वे कर्ण को असत्य बोल के विद्या लेने के लिए शाप दे देते है।
अर्थात् यहां एकलव्य के बाद फिर से यह साबित होता है कि विद्या में असत्य का कोई स्थान नहीं था। यदि कोई विद्या चुराये या अपना सही परिचय न देकर विद्या ग्रहण करें तो इस के लिए उसे दंड अथवा शाप दिया जाता था। सुदामा ने भी कृष्ण के हिस्से का चावल खा लिया था तो इस का दुष्परिणाम उस को अकिंचन रह कर भुगतना पडा था। और सुदामा ब्राह्मण था। इस लिए व्यक्ति किसी भी जाति का हो, किन्तु वह कुकर्म करे तो इस का दुष्परिणाम उसे भुगतना ही पडता था।

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