श्री कृष्ण की इको सिस्टम भाग-१- अर्जुन के लिए स्पष्ट पक्षपात

श्री कृष्ण की इको सिस्टम भाग-१- अर्जुन के लिए स्पष्ट पक्षपात

by Jaywant Pandya

महाभारत की कहानी, वही भारत की कहानी- लेखांक ९

(महाभारत के चार प्रकरण (२७-२८ अप्रैल २०२० के चार एपिसॉड) की बात आगे बढाता हूं)

इस प्रकरणों में श्री कृष्ण की इको सिस्टम देखने को मिलती है। जैसे दुर्योधन ने किशोरावस्था से अंग देश कर्ण को देकर अपनी इको सिस्टम बनाई, अपने पिता और हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र को अपने वश में रखा एसे ही श्री कृष्ण ने भी अपनी इको सिस्टम बनाई थी। ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर ने नहीं।

तो अब दुर्योधन शकुनि की भी कोई बात मानने को तैयार नहीं। उस की हठ कर्ण और दुःशासन के समर्थन और हां में हां से इतनी जटिल हो चूकी है कि वह शकुनि का भी अपमान करता है। कर्ण पहले द्युत आदि का विरोध करता था और युद्ध में उतरके नीति और बल से पांडवो को परास्त करना चाहता था, तब शकुनि के वश में दुर्योधन था। किन्तु अब दुर्योधन ही निर्णय की धूरा संभाल चूका है। और कर्ण को भी पहेले से अर्जुन के विरुद्ध युद्ध कर के अपने आप को अधिक प्रवीण और बलशाली साबित करना था, जो वह तरुणावस्था में जब कौरव और पांडव द्रोण से विद्या सिखने के बाद रंगभूमि में अपनी प्रवीणता साबित कर रहे होते है तब अर्जुन के विरुद्ध अपनी प्रवीणता साबित करना चाहता था, किन्तु वह राजकुमार नहीं था इस लिए उसे एसा करने नहीं दिया था। यह कसक उस के मन में तब से थी जो अब पूरी होने जा रही थी। अर्थात् कौरवो के पक्ष में जो भी लोग थे उन के मन में अपने व्यक्तिगत प्रतिशोध की भावना थी, उस में धर्म का कोई स्थान नहीं था। शकुनि को इस बात का दुःख था कि उस की बहन का विवाह अंध धृतराष्ट्र से हुआ जो पांडु की कृपा से राजा बना और बहनोई अंध होने के कारण बहन गांधारी ने अपनी आंख पर पट्टी बांधकर आजीवन अंधत्व स्वीकार लिया। शकुनि को युद्ध पसंद नहीं था क्योंकि वह कपटी जानता था कि युद्ध हुआ तो कौरव हारनेवाले ही है। किन्तु दुर्योधन अब शकुनि की बात नहीं मानता। उस का भी अपमान करता है। अपमान के घूंट पीकर भी मामा शकुनि उसे कहता है कि वह जाकर श्री कृष्ण की मदद मागे।

वह जाता है, पहले पहोंच जाता है किन्तु श्री कृष्ण के सर के बाजु में रखे हुए सिंहासन पर बैठ जाता है। दूसरी ओर अर्जुन भी आते है। वह श्री कृष्ण के सामने पैरों के पास खडे रहते है। स्वाभाविक श्री कृष्ण नींद में से जागने के पश्चात उनका ध्यान पहेले अर्जुन की ओर जाता है। किन्तु यहां पर भी दुर्योधन हठ करता है। अर्थात् प्रत्येक बात में हठ का दूसरा नाम दुर्योधन है। दुर्योधन कहता है कि वह पहले आया था इस लिए उस का पहला अधिकार है श्री कृष्ण के पास मांगने का। दुर्योधन द्वारा इतना अन्याय-अत्याचार के उपरांत भी अर्जुन कहता है कि दुर्योधन पहले आया था। यहां पर अर्जुन की आंखो में दुर्योधन के प्रति कोई धिक्कार नहीं है, तिरस्कार अवश्य है। किन्तु श्री कृष्ण कहते है कि फिर भी अर्जुन अनुज है इस लिए वह ही पहले मांगेगा। यहां पर श्री कृष्ण अपने आप को निरपेक्ष अथवा तटस्थ दिखाने की चेष्टा नहीं करते। अर्जुन ने तो फिर भी इतने अपमानो के बाद भी तटस्थ दिखने के लिए दुर्योधन पहले आया था एसा कहा, किन्तु श्री कृष्ण अर्जुन अनुज है ऐसी दलील कर के उस को प्रथम अवसर देते है।

और एक ओर श्री कृष्ण की नारायणी सेना है और दूसरी ओर श्री कृष्ण स्वयं जो निहत्थे होंगे, वह शस्त्र नहीं उठायेंगे। अर्जुन श्री कृष्ण को चुनते है। क्योंकि वह जानते है कि वह युद्ध कला समेत ६४ कलाओ में निपुण है। वह मास्टर ऑफ स्ट्रेटेजिस्ट है। रणनीतिकार है। प्रखर बुद्धिमान है। बचपन में निहत्थे होते हुए मामा कंस का वध किया था। बचपन में अनेक राक्षसों को निहत्थे ही मारा था। शिशुपाल का वध एक सुदर्शन चक्र से ही कर दिया था। जरासंध को कैसे मारा जा सकता है इस का भेद वह जानते थे और उन्हों ने भीम-जरासंध द्वंध युद्ध में प्रत्यक्ष न होते हुए भी संकेत में भीम को कह दिया था कि जरासंध को कैसे मारा जा सकता है। तो श्री कृष्ण भगवान थे इस कारण हो या न हो, किन्तु एसे रणनीतिकार को गंवाना नहीं चाहिए इस दृष्टिकोण से भी अर्जुन ने श्रीकृष्ण को मांग लिया अपने सारथी के रूप में। जब दुर्योधन यह बात शकुनि को गर्व से कहता है कि उसने नारायणी सेना पा ली है तब शकुनि भी निराशा दर्शाता है कि श्री कृष्ण को मांगना चाहिए था। वह निहत्था होने पर भी कौरवों पर भारी पड सकते है।

फिर से द्रुपद और मत्स्य देश के राजा विराट की उपस्थिति में पांडव-कृष्ण-शिखंडी आदि चर्चा करते है। फिर से युद्ध की बात होती है। किन्तु श्री कृष्ण फिर से समजाते है कि युद्ध होगा तो सामने भीष्म-द्रोण-कृपाचार्य भी होंगे। जैसे सामने शव गिरेंगे वैसे इस पक्ष में अर्थात् पांडवो के पक्ष में भी शव गिरेंगे। अब समजें कि अर्जुन के मन में निराशा कहां से आई? श्री कृष्ण ने ही जाने-अनजाने उस के मन में निराशा के बीज बो दिये थे। श्री कृष्ण कहते है कि वह शांति प्रस्ताव लेकर जाएंगे। वह भीम को फिर से समजाते है कि यौद्धा केवल धर्म की रक्षा के लिए लडता है और आनेवाला इतिहास आज के यौद्धाओं को मूल्य की तुला में तोलेगा। पांडवो की पूरी सभा थोडे विरोध के बात संमत हो जाती है।

श्री कृष्ण और द्रौपदी का संवाद भी होता है। दोनों सखा है। दोनों अकेले बैठकर बात करते है। रामायण और महाभारत में बारंबार (द्रौपदी वस्त्राहरण का अपवाद को निकाल दे) यह देखने को मिलता है कि स्त्रीओं का कितना मान था। स्त्री कितनी स्वतंत्र थी। अपनाा पति पसंद करने की उसे स्वतंत्रता थी। वह राज्य कार्यभार में भी हिस्सा लेती थी। और जैसे एक पुरुष और दूसरे पुरुष के बीच मैत्री संभव हो सकती है वैसे ही एक स्त्री-पुरुष में सखाभाव जैसा पवित्र संबंध भी हो सकता है।

द्रौपदी श्री कृष्ण को अपने अपमान की बात याद दिलाती है और कहती है कि क्या वे फिर भी शांति का प्रस्ताव रखेंगे? इस पर श्री कृष्ण वचन देते है कि वह अपना अपमान सह लेंगे किन्तु पांडवो के आत्मसम्मान का बलिदान देकर शांति नहीं लेंगे। यहां पर फिर से श्री कृष्ण की धर्म और सखा-सखी के लिए अपने स्वयं के अपमान को अनदेखा कर लेंगे किन्तु पाडंवो का आत्मसम्मान को हानि नहीं होने देंगे। यह है श्री कृष्ण की इको सिस्टम। जो उन के प्रति विश्वास रखता है, जिन की पूजा सर्व प्रथम राजसूय यज्ञ में पांडवोने की थी, उन पांडवो के आत्मसम्मान को ठेस नहीं पहोंचनी चाहिए।

श्री कृष्ण आनेवाले है यह सून कर कौरव और धृतराष्ट्र में अशांति हो जाती है। भीष्म और विदूर भी धृतराष्ट्र को कहते है कि अब तो मान जाओ। किन्तु धृतराष्ट्र का बार बार दोहरा चरित्र देखने को मिलता है। वह राज्य सभा में, भीष्म/विदूर/संजय के पास बहोत दुःखी है, युद्ध नहीं चाहता ऐसा प्रस्तुत आता है किन्तु गांधारी के पास वह अपने साथ हुए अन्याय की बात करके कौरव जीत जाएंगे ऐसा कहता है।

श्री कृष्ण आए तब भरपूर सम्मान होना चाहिए। पथ में लोगों को खडा करना चाहिए। दुर्योधन को स्वयं लेने जाना चाहिए। ऐसा सुझाव आता है। यह सब इस लिए नहीं कि श्री कृष्ण भगवान थे। अथवा धर्म के पक्ष में थे। वह इस लिए कि बचपन से ही वह कंस समेत राक्षसों का संहार करते आए थे। और कुछ समय पूर्व ही भरी सभा में उनकी (कौरवों की, भीष्म, विदूर आदि सभी की) उपस्थिति में एक सुदर्शन चक्र से ही शिशुपाल का वध किया था। वह जानते थे कि श्री कृष्ण ९९ अपराध क्षमा करेंगे किन्तु सो समाप्त होने पर सुदर्शन चक्र चला देंगे। तो सज्जनों को चाहिए कि वह शक्ति एकत्रित करे। और समय आने पर उस का प्रदर्शन भी करें। शक्ति प्रदर्शन के बिना कोई आप को महत्त्व नहीं देगा। सम्मान नहीं देगा। आप की बात नहीं सूनेगा। भले ही न्याय, धर्म और सत्य आप के पक्ष में हो। किन्तु यह भी याद रखना है कि यह शक्ति प्रदर्शन बात बात में और क्षुल्लक बातों में करना भी ठीक नहीं है।

(श्री कृष्ण की इको सिस्टम का आलेख जारी है)

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