द्रौपदी वस्त्राहरण और आधुनिक भारत की कहानी

द्रौपदी वस्त्राहरण और आधुनिक भारत की कहानी

by Jaywant Pandya

 

द्युत क्रीडा में द्रौपदी आदि को दांव पर रखने का कौरवो के पक्ष से केवल विकर्ण ने विरोध किया था

महाभारत की कहानी, वही भारत की कहानी-लेखांक ३

आज के एपिसॉड में द्रौपदी का वस्त्राहरण और द्रौपदी की चित्कार, सभा में मौन बैठे बुजुर्गो से, अपने पति से प्रश्न यह बहोत ही संवेदना उपजानेवाला दृश्य था। द्रौपदी के प्रश्न तब भी चुभनेवाले थे। आज भी है। द्रौपदी के प्रश्न का न तो भीष्म के पास उत्तर था, न तो स्पष्ट-स्पष्ट बोलने वाले विदूर के पास।

द्रौपदी श्राप देने जानेवाली ही थी तब गांधारी आ जाती है। थोडा बहोत अपने आप को, अपने पुत्र को कोस लेती है, लेकिन इसी कार्य से वह अपने पुत्रों को द्रौपदी का श्राप मिलने से, विनाश होने से बचा लेती है। रही सही कसर हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र पूरी कर देते है। वह द्रौपदी को वरदान मांगने को कहते है। जैसे द्रौपदी की आबरू इस वरदान से लौट आएगी। द्रौपदी भी कुशल प्रकार वरदान मांगती नहीं। मांग भी नहीं सकती। क्योंकि उस समय उस का दिमाग जरूर बंध हो गया होगा। पीडा उछल रही होगी। उस समय वह भला क्या मागती। सो पहले वरदान में अपने को हार जाने के बाद भी अपनी संयुक्त पत्नी द्रौपदी को द्युत में दांव पर लगानेवाले युधिष्ठिर को दासत्व (गुलामी, जनाब!) से मुक्ति मांगी। दूसरे वरदान में अपने दूसरे पतिओं की दासत्व से मुक्ति, अस्त्र, शस्त्र मांगे। फिर अटक गई। कहा, लोभ अच्छा नहीं। दो ही वर मांगने चाहिए। फिर भी धृतराष्ट्र युधिष्ठरने जो कुछ गंवाया था वह लौटा दिया। यह एसा ही है कि यातनामय बलात्कार की पीडिता को धन देकर सब भूल जाने को कहना।

विदूर अपनी भाभी गांधारी के पास जाते है और महारानी की जय हो एसा बोलते है तब गांधारी पूछती है- महारानी की जय जैसा कुछ है क्या? और भाभीश्री के स्थान पर महारानी संबोधन क्यों? तब विदूर दुर्योधन ने भरी सभा में विदूर का जो अपमान किया था उस का स्मरण कराते है। और कहते है कि इस के बाद संबंध समाप्त हो गया। भरी सभा में द्रौपदी के वस्त्राहरण पर विदूर और कौरव विकर्ण ने विरोध किया था। औरों ने नहीं। द्रौणाचार्य और कृपाचार्य ने भी नहीं। इस संदर्भ में गांधारी के प्रश्न के उत्तर में विदूर कहते है कि सभी के पास (भीष्म, द्रौण, कृपाचार्य) अपनें अपनें तर्क होगे। और एसा ही होता है।

जाते समय पांडव भीष्म के दर्शन को नहीं आते। इस लिए नहीं कि गुस्सा है। किन्तु वह आते तो द्रौपदी को भी आना पडता। और द्रौपदी क्रोध और दुःख की ज्वाला में तडप रही थी। वह भीष्म पर प्रश्नो के बाण की वर्षा कर देती जो भीष्म भी झेल नहीं पाते। किन्तु अर्जुन आशीर्वाद लेने अवश्य आता है। और कहता है कि वह अवश्य प्रतिशोध लेगा। तब भीष्म कहते है कि प्रतिशोध लेना, अर्थात् मेरा सामना करना। आचार्य द्रौण का सामना करना। भीष्म कहते है कि आज जब युद्ध की धमकी तुम दे रहे हो तो क्या ज्येष्ठ भ्राता से पूछा है? तो फिर द्युत के समय क्यों नहीं पूछे बिना खडे हुए और द्रौपदी के अपमान का विरोध में कठोर कदम नहीं उठाये? जब अर्जुन पूछता है कि क्या तो युद्ध करना चाहिए तो भीष्म नरो वा कुंजरो वा कि भांति डिप्लॉमेटिक जवाब देते है कि इस का निर्णय तुम लोगों को स्वयं लेना है।

इस कहानी का आधुनिक भारत की कहानी से कैसे मैल खाता है? भारत में स्वतंत्रता पूर्व तुर्की के खिलाफत आंदोलन को समर्थ देकर कट्टरवादी मुस्लिमो को तुष्ट करने की परंपरा गांधीजी द्वारा शुरू की गई। इस के बाद यह बढता ही गया। दुर्योधन की भांति अनेक चाल चली गई। मलाबार में १९२१ में मोपला मुस्लिमों द्वारा हिन्दूओ की बर्बर हत्या, स्वामी श्रद्धानंद की हत्या। वंदे मातरम् का विरोध। भारत का विभाजन न हो इस के लिए मोहम्मद अली झीणा को प्रधानमंत्री बनाने तैयार हो जाना। मेरी लाश पर ही विभाजन होगा एसा कहनेवाले गांधीजी द्वारा विभाजन के लिए भीष्म के प्रकार तैयार हो जाना। दोनों की निष्ठा में कोई कमी नहीं थी। दोनों हस्तिनापुर/भारत का भला चाहते थे। लेकिन अन्याय को तुष्ट और न्यायी को शांत बनाये रखना।

बचपन से लेकर द्युत तक युधिष्ठर द्वारा धर्म के नाम पर कौरवों द्वारा षडयंत्र के उपरांत भी सहन करते आना। स्वंय तो सहन करना ही, अपने अनुजों को भी हथियार उठाने रोकना। द्युत में भी द्रौपदी वस्त्राहरण, द्रौपदी को वेश्या कहे जाने पर, गुस्से से तिलमिला उठते भीम और अर्जुन को रोकते रहना। अपनी छबि धर्मराज के रूप में चालु रखने के लिए एसा करना। एसा कहने में कोई समस्या नहीं कि युधिष्ठर को जवाहरलाल नहेरु कहा जा सकता है। जो सरदार जैसे भीम और श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे अर्जुन को रोकते आये। सहदेव जैसे बाबासाहब आंबेडकर को रोकते आये।

विभाजन के समय न जाने कितने पांडवो की संपत्ति गई, न जाने कितनी द्रौपदींओ की लाज लूटी गई, भीष्म-युधिष्ठर और इन दोनों के मौन के कारण पांडव देखते रहे…कभी गांधारी बीच में आ गई-थोडा अपने लोगों को कोस लिया लेकिन अटकाया नहीं और द्रौपदी के श्राप से बचा लिया, कभी धृतराष्ट्र ने धन-संपत्ति देकर मना लिया…

(पहली, दूसरी और चौथी तसवीर का परिचय आवश्यक नहीं, तीसरी तसवीर विकर्ण की है- काश! आज एसे विकर्ण जोरशोर से बहार आए)

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