धृष्टद्युमन का मदद का प्रस्ताव और भारत-इजरायल संबंध

धृष्टद्युमन का मदद का प्रस्ताव और भारत-इजरायल संबंध

by Jaywant Pandya

 

महाभारत की कहानी, वही भारत की कहानी- लेखांक ४

आज (२१ अप्रैल २०२०) को महाभारत में पांडवो को हुए फिर एक नये अन्याय के पश्चात पहली बार कुन्तीने गजब का दांव खेला। वनवास का आदेश पांडवो को था। वे चूपचाप वनवास जा सकते थे। अथवा हस्तिनापुर में जब राज्यसभा न हो तब अपने अपने भवनों में ज्येष्ठ पिता श्री धृतराष्ट्र, पितामह भीष्म, काका श्री विदूर को नमन कर के वनवास जा सकते थे। किन्तु कुन्ती भरी राज्यसभा में सब के बीच श्वेत वस्त्र में आभूषण उतार कर अपने पुत्रों के साथ आई। और तीखे स्वर के साथ बोली कि वे वन में जाने की अनुमति लेने आई है। तब पदचाप से पहचान जानेवाले नेत्रहीन धृतराष्ट्र ने ढोंग करते हुए पूछा कि क्या कुन्ती आई है? अर्थात् धृतऱाष्ट्र में शठ राजनीति कूटकूट कर भरी थी।

कुन्ती ने दांव खेला तो विदूर ने भी दांव खेला। यद्यपि ये दोनों के दांव सत्यनिष्ठ थे। सत्य के लिए भी दांव खेलना आवश्यक हो जाता है और वो भी तब जब सामनेवाला कोई नीति-नियम में माननेवाला न हो। ‘रामायण’ के समय श्री राम, सीता जी को एसे दांव खेलने की आवश्यकता नहीं थी। क्योंकि बाद में मंथरा और कैकेयी को अपने कृत्य का पश्चाताप भारी हुआ था। भरत ने भी अपनी सगी जननी ने अन्याय किया है वह पहेली बार जानकारी मिलने पर ही मान लिया था। वह माता और दासी मंथरा के बहकावे में नहीं आया था। किन्तु कुन्ती और विदूर को दांव खेलना पडा। विदूर ने कुन्ती के वनवास में जाने प्रस्ताव पर यह कहा कि भाभी श्री आप को तो वनवास जाने का आदेश नहीं है। कुन्ती कहती है वह हस्तिनापुर के इस भवन में कैसे रह पायेगी जहां उस की कुलवधू द्रौपदी का वस्त्राहरण हुआ है। तब विदूर कहते है कि एसा है तो कुन्ती उनकी कुटिया में रह सकती है।

और कुन्ती उनका प्रस्ताव मान लेती है।

इस पर धृतराष्ट्र तिलमिला उठता है। याद रहे अब तक, धृतराष्ट्र अच्छा-विवेकी प्रस्तुत होता था। लेकिन द्रौपदी वस्त्राहरण के बाद दुर्योधन की जैसे हिंमत खुल गई और वह ओर भी अविवेकी और अपनी मनमानी करनेवाला बनता गया, उसने फिर से द्युत खेलने के लिए युद्ध अथवा द्युत अथवा आत्महत्या की धमकी देकर पिता को विवश कर दिया था उसी प्रकार धृतराष्ट्र की भी हिंमत खुल गई। क्योंकि वस्त्राहरण में जिस प्रकार भीष्म, आचार्य द्रौण, कृपाचार्य मौन रहे उसे अब समज में आ चूका है कि भीष्म सिंहासन से बंधे हुए है और अब बहोत ही वृद्ध हो चूके है, अब कुछ नहीं करेंगे, ज्यादा से ज्यादा दो कडवे वेण बोलेंगे, वह भी एकांत में। आचार्य द्रौण और कुल गुरु कृपाचार्य भी सिंहासन तरफ से जो मदद मिल रही थी, इस के कारण ब्राह्मणत्व गंवा चूके थे। इसी लिए धृतराष्ट्र की हिंमत ओर खुल गई थी। इस लिए जब विदूर भीष्म का यह प्रस्ताव कि तेरह दिन हो गये है, और शास्त्र में विशेष परिस्थिति में दिन को वर्ष मानने का निर्देश है इस लिए तेरह वर्ष हो गये एसा मान कर हस्तिनापुर वापिस बुला लिया जाए, धृतराष्ट्र से मिलने आये तो विदूर को कडवी बातें सूना दी कि वह हंमेशां पांडु और पांडवो की मदद करते आये है, वह हस्तिनापुर के नहीं, पांडवो के महामंत्री है आदि आदि। धृतराष्ट्र को यह भी स्वीकार्य था कि कुन्ती वनवास चली जाये अथवा हस्तिनापुर भवन में रहे किन्तु विदूर के यहां न रहे।

इस का कारण यह था कि यदि कुन्ती विदूर की कुटिया में रहती तो धृतराष्ट्र और कौरवो द्वारा पांडवो के साथ हुआ अन्याय हस्तिनापुर की जनता कभी भूल नहीं पाती। और हो सकता है वह विद्रोह कर बैठे। अथवा पांडवो द्वारा आक्रमण की स्थिति में वे पांडवो का साथ दे। और धृतराष्ट्र से एकांत में जो गांधारी थोडा बहोत समजाने का प्रयास कर रही थी वह भी धृतराष्ट्र की इस बात को मौन रहकर सूनती रहती है। अंत में धृतराष्ट्र विदूर को महामंत्री पद से निकाल देता है। भीष्म विदूर के चले जाने से अति आवेश में धृतराष्ट्र से मिलने आते है और विदूर को वापिस बुलाने को कहते है। धृतराष्ट्र भीष्म का क्रोध का सामना नहीं कर पाता और विदूर को बुलावा भेजता है, विदूर पांडवो से मिलने गये होते है।

विदूर पांडवो से मिलने गये इस से पहले पांडवो में युधिष्ठिर को छोड चारों भाई वल्कल त्याग राजसी वस्त्र पहन कर तेरह दिन हो गये अर्थात् तेरह वर्ष बित गये मान कर हस्तिनापुर पर आक्रमण करने को तैयार हो गये और युधिष्ठिर को भी कहा। किन्तु युधिष्ठिर ने कहा कि वह धर्म के अनुसार अपनी भूल का प्रायश्चित करने के लिए पूरे बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञात वास में रहेंगे ही। अपने अनुजो को जाना है तो जा सकते है। किन्तु उसे ज्ञात था कि अनुज कदापि नहीं जाएंगे। इस पर द्रौपदी आती है और ताना मारती है कि आप के ज्येष्ठ भ्राता के लिए धर्म तोडनेमरोडने की वस्तु है। जब द्युत खेलना होता है, अपने भाईओ को-अपनी पत्नी को दांव पर लगाना होता है तब धर्म आडे नहीं आता किन्तु अभी वह धर्मानुसार ही चलेंगे।

इतने में रथ की आहट सुनाई देती है। द्रौपदी का भाई धृष्टद्युमन आता है। और कहता है चलिए, हम हस्तिनापुर पर आक्रमण करते है। धृष्टद्युमन का जन्म ही भीषम के विरुद्ध पुत्र की कामना से द्रुपद ने जो यज्ञ किया था उसकी अग्नि से हुआ था। अर्थात् वह अपने आप को ज्वाला पुत्र कहता था। किन्तु युधिष्ठिर ना बोलते है और कहते है कि यदि द्रौपदी को व्यक्तिगत अपमान पांडवो के अपमान से अलग लगता हो तो वह भी अपने भाई के साथ आक्रमण करने जा सकती है। इस इमॉशनल ब्लेकमेइलिंग में आकर द्रौपदी फिर से अपमान का घूंट पी कर अपने भाई से कहती है कि विवाह के बाद उस का भाग्य पांडवो के साथ ही जुडा हुआ है। इस लिए धृष्टद्युमन चला जाए। धृष्टद्युमन जब भी युद्ध की आवश्यकता हो तो अपने राज्य की ओर से मदद का वचन देकर चला जाता है।

अब आज की इस महाभारत की कहानी को भारत की आधुनिक कहानी से कैसे जोडा जा सकता है?

पांडवो के प्रकार हिन्दूओं के साथ-इस देश की पौराणिक ५००० वर्ष से भी ज्यादा वर्ष की धरोहर के साथ स्वतंत्रता के बाद से बहोत अन्याय हुआ। अर्थात् वंदे मातरम् जो हिन्दू-मुस्लिम सब स्वतंत्रता के साथ गाते थे, उस को राष्ट्रगान नहीं बनाया गया। दो-तीन राज्यों के विरोध के कारण प्रशासन की भाषा हिन्दी नहीं रखी गई। किन्तु उस में उर्दू शब्द आ गये। लेकिन मुख्य भाषा अंग्रेजी बन गई। इतिहास और शिक्षण में से हिन्दू गौरव का जो भी इतिहास था वह निकाल दिया गया, मोगलकालीन इतिहास को गौरव से स्थापित किया गया। मदरसा और कॉन्वेन्ट स्कूलों में इस्लाम और इसाई पंथ का शिक्षण देने की छूट दी गई किन्तु हिन्दूओ को एसी छूट नहीं मिली। किन्तु जैसे पांडवो ने अपने अन्याय की बात जोरशोर से लोगों को, भीष्म पितामह, विदूर के सामने नहीं रखी। कश्मीर के हिन्दूओं के साथ जो कुछ हुआ तो उन्हों ने कभी प्रदर्शन कर के, डॉक्युमेन्टरी या फीचर फिल्म बना कर अपनी बात नहीं की। ना ही प्रत्येक १९ जनवरी को प्रदर्शन इतने बडे स्तर पर किया। इतने वर्षो के बाद विधु विनोद चोपडा की हिंमत खुली तो उस में भी उन्होंने बेलेन्सिंग का बहोत प्रयास किया।

कुन्ती ने जैसा राज्यसभा में आकर किया और बाद में विदूर के प्रस्ताव को मानकर उनकी कुटिया में हस्तिनापुर में ही रही वैसा करना चाहिए था। सत्य को भी अपना पक्ष रखने के लिए सब के सामने जोरशोर से आना चाहिए। आज भी तबलीगी जमात द्वारा कोरोना वाइरस की बात आती है तो लोग दबी जिह्वा से बोलते है। फुसफुसाते है। आतंकवाद की बात आती है तो भी बेलेन्सिंग का एक्ट आ जाता है। मौलवी साद की बात आती है तो भी एसा ही होता है। जैसे पांडवो के साथ अन्याय के कारण विकर्ण को छोड भीष्म-धृतराष्ट्र-द्रौण-कृपाचार्य मौन रहे तो अंत में क्या हुआ। कौरवों के साथ उनका भी नाश हुआ। इसी प्रकार इस्लामिक आतंकवादीओ की- तबलीगी जमात की चेष्टाओं के विरुद्ध न बोलनेवाले मुस्लिम अपने ही समाज पर कुठराघात कर रहे है।

दूसरा। युधिष्ठर द्वारा जब जी चाहे धर्म को तोडना और जब जी चाहे धर्म को मानना। यानि स्युडो सेक्युलरिझम। अपनी छबि पूरे समाज में अच्छी बनाई रखना। भारत में नहेरुजी से लेकर आज के अरविंद केजरीवाल-लालु प्रसाद यादव- ममता केजरीवाल तक एसा ही है। कभी कभी तो अटलजी भी २००२ और २००४ में एसी ही स्थिति में आ गये थे। अन्यायी चाहे जितने नीतिनियम तोडे वह उनके प्रति स्नेह ही रखेंगे। वह उन का आदर ही करेंगे। चाहे वह समजौता कितना ही कच्चे आधार पर क्यों न खडा हो, वह उस का पालन करेंगे ही। वह अपनेवालों को अन्याय करते रहेंगे। अपनी पत्नी के अपमान का घूंट पीते रहेंगे। पत्नी व अनुजो को चूप करातें रहेंगे। किन्तु अन्यायीओं के विरुद्ध कुछ भी कहने की कोई हिंमत नहीं होगी। पहली वार पाकिस्तानने कबाइलीओ को आगे कर के कश्मीर पर आक्रमण किया। नेहरुने सेना भेजने में देरी की। सरदार ने निर्णय न लिया होता तो और देरी होती। उस के बाद आधे रस्ते में सेना को रोक दिया। युएन चले गये। अब इस में युएन का क्या काम? १९६५ में फिर पाकिस्तान रूपी दुर्योधन ने आक्रमण किया। फिर से सोवियेत संघ में समजौता करने वामन कद के विराट पुरुष लालबहादुर शास्त्री पहोंचे। वहां जाने की क्या आवश्यकता थी? चौकी लौटाने की क्या आवश्यकता थी? क्या सोवियेत संघ, आज का रशिया वास्तव में भारत का मित्र निकला?

१९७१ युद्ध में पाकिस्तान का विभाजन हुआ किन्तु मंत्रणारूपी द्युत में भारत रूपी पांडव हार गये यह बात मैं पहले लिख चूका हूं। किन्तु बांग्लादेश का सर्जन कर कर हमने क्या पाया? बांग्लादेशी शरणार्थीओ का चिरकालीन सिरदर्द? बांग्लादेश में पाकिस्तान की आईएसआई द्वारा भेजी जाती भारतीय करन्सी का प्रसार?

१९९९ में पाकिस्तान ने फिर से मुजाहिद्दीन के रूप में कारगिल हिल पर कबजा कर लिया। तब भी अटल जी रूपी युधिष्ठिर ने सेना को आदेश दिया- सरहद पार नहीं करनी है। हां एक दृढता अवश्य रखी। भारतीय सैन्य की वीरता के कारण जब पाकिस्तानी सैन्य को हानि होने लगी और तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाझ शरीफ युद्ध रुकवाने के लिए युएस भाग गये तब अटलजीने कहा कि पहले युद्ध रुकवाईए, तभी कोई मंत्रणा होगी। आगरा में भी आडवाणी रूपी भीम ने पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के मुद्दे को समजौते में सामिल करने का दृढाग्रह रखा और कोई समजौता नहीं हुआ।

धृष्टद्युमन की कहानी यह कि हमें इजरायल ने बारबार मदद की, मदद करने का प्रस्ताव भी करता रहा। कभी हमने नकारा, कभी दुनिया से छूप कर स्वीकारा। श्री कृष्ण ने राजसूय यज्ञ इस लिए करवाया था (मोदीने जैसे ढेर सारे देशों की विदेश में यात्रा की) जिस से देरसवेर युद्ध कना पडे तो पांडवो के पक्ष में बहोत सारे राजा हो। इजरायल से हमारे आधिकारिक संबंध नरसिंहराव की बिन-गांधी परिवार की कॉंग्रेस सरकार के समय और बाद में मोदी सरकार में स्थापित हुए।

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