कोरोना वायरस: शराब और भांग…

कोरोना वायरस: शराब और भांग…

by Jaywant Pandya

दो दिन (४ मई) से जिस प्रकार शराब की दुकानों में भीड उमड रही है, यह थोडा आत्यंतिक हो सकता है किन्तु उस से लगता है कि यह देश शराबीओं का तो नहीं? शराब के एक ग्राहक ने तो यहां तक कह दिया कि (शराब की खरीदी) यह हमारा देश के प्रति प्रदान है।

मैंने पहेले भी जो लिखा था कि शराब की दुकानें खोलने की छूट राज्य सरकारोने आय कमाने के लिए दी है। किन्तु वहां ही यह छूट है जहां अनुभवहीन अथवा अपेक्षा से अल्प सूझबूझवाले मुख्यमंत्री है। झारखंड में हेमंत सोरेन ने मना कर दिया है कि आय जाती है तो जाए वह शराब की दुकानें खोलने की अनुमति नहीं देंगे। दूसरी ओर शराब विक्रेताओ ने भी सामाजिक उत्तरदायित्व दिखाते हुए कहा कि वे दुकानें नहीं खोलेंगे क्योंकि इस से लोग एकदूसरे से अंतर रखकर खडें नहीं होंगे और पुलिस के लिए कठिनाई होगी।

www.jagran.com/jharkhand/ranchi-covid-19-lockdown-jharkhand-wine-shops-closed-during-lockdown-extension-3-ordered-jharkhand-government-liquor-shop-20243509.html

दिल्ली में शराब खरीदने एक भाई तो सरकार और प्रशासन को गाली दे रहे थे कि (केजरीवाल) सरकार ने खोलने की छूट क्यों दी? अरे भाई! सरकार ने खोलने की छूट दी इस का अर्थ यह तो नहीं कि आप एक दूसरे से सटे हुए खडे रहो?

कुछ महिलाएं भी शराब की दुकान में दिखी तो निर्माता-निर्देशक रामगोपाल वर्माने ट्वीट कर दिया कि ये देखिये शराब खरीदने कि लाइन में कौन खडा है? पियक्कड पुरुष से बचाने के लिए क्या कुछ हो रहा है इस के उपर महिलावादी गायिका सोना महापात्रा ने लिखा कि महिलाओं को भी शराब खरीदने का और पीने का अधिकार है। हां, किसी को पियक्कड बनने का और हिंसक बनने का अधिकार नहीं है।

www.timesnownews.com/india/article/ram-gopal-varma-slammed-for-making-sexist-remarks-on-women-buying-liquor/587045

‘तारा’ धारावाहिक में कंचन (रत्ना पाठक शाह ) अपने पिता और प्रेमी के साथ शराब पीती हुई।

अब प्रश्न यह आता है कि पुरुष जो भी खराब व्यसन की आदत अपनाये वह सब महिलाओं को अपनाना आवश्यक है क्या? केवल महिला समानता के लिए? किन्तु आज वैब सीरिझ हो या फिल्में उस में महिलाओं को दारू और सिगारेट पीती दिखाई जाती है। और आज अमदावाद, मुंबई जैसे शहर में पढाई करती या जोब करती कुछ लडकियां सिगारेट पीती दिखेगी भी। पहले टीवी पर (दूरदर्शन की मोनोपोली के जमाने में) ऐसे कोई दृश्य नहीं आते थे। किन्तु स्टार टीवी के साथ भागीदारी में आज राष्ट्रवादी बन गई चैनल झी टीवी ने हिन्दी चैनल चालु किया उस में ‘तारा’ धारावाहिक में नारी को बॉल्ड दिखाने के लिए सिगारेट पीती दिखाई गई। शराब पीती दिखाई गई। तारा के पिता तारा को शराब पीने की ऑफर उस के नियोक्ता और होटल मालिक दीपक शेठ के सामने देता है। तो अनौरस बेटी कंचन के पिता कंचन के प्रेमी के साथ शराब पीते दिखाई गये थे। वास्तव में एकता कपूर टाइप की (कसौटी जिंदगी की) सिरियल की ये जननी कही जा सकती है।

इस से पहले ‘दीवार’ में परवीन बाबी, ‘अजनबी’ में योगीता बाली को सिगरेट पीता दिखाया गया था। आज तो टीवी पर ‘हप्पु की उलटन पुलटन’ जैसी सिरियल में दादी को शराब पीता दिखाया जाता है। मैं थोडा विषयांतर कर गया।

किन्तु शराब को मोगल काल से ग्लैमराइझ किया गया। शायरों ने शराब को ग्लैमराइझ किया। हंगामा क्यों है बरपा, थोडी सी जो पी ली है…हिन्दी फिल्मों में भी शराब को ग्लैमराइझ किया गया। अमिताभ अधिकतर फिल्मों में शराबी हुआ करते थे।

timesofindia.indiatimes.com/home/science/Alcohol-consumption-three-times-higher-among-youngsters-watching-Bollywood-movies-Study/articleshow/12743986.cms

महात्मा गांधी ने इस की खराब असरों को पहचान कर पूरे देश में इस पर प्रतिबंध लागु करने की बात की, लेकिन वह हो न सका। हां उन के राज्य गुजरात में वह अवश्य हुआ है। इस के कारण गुजरात समृद्ध भी हुआ। क्योंकि शांति और सुरक्षा दोनों ही मिलती है तो समृद्धि आती ही है।

अब प्रश्न यह भी उठाना चाहिए कि क्या पूरे देश में शराब पर पाबंदी केवल उस पर मिलनेवाली आय के कारण नहीं है? या मन के भीतर जो अंग्रेजो का दासत्व रहा उस के कारण हमनें नहीं लगाई? क्योंकि जो भी युरोपीय देश है वहां शराब पर पाबंदी नहीं है।

किन्तु जितनी बूरी दृष्टि से भांग-गांजा लेनेवालों को देखा जाता है, उतनी बूरी नजर से शराब पीनेवालो को नहीं। क्योंकि शराब को फैशनेबल बना दिया गया है। यदि आप अमीर दिखना चाहते है तो शराब पीना पडेगा। यदि आप गरीब है तो, वो उर्दू में क्या कहते है, ‘गम को हल्का करने के लिए’ पीना पडेगा। गरीब सस्ती दारू – लठ्ठा पीता है। अमीर इम्पॉर्टेड दारू पीता है। मध्यम वर्गीय एफॉर्ड कर सके एसी पीता है। भारत में भांग, गांजा आदि कुछ साधु लेतें है। इस से समाधि लग जाती है। चरम सुख प्राप्त होता है ऐसा कहते है। ब्रिटन सरकार ने इस पर बहोत टेक्स लगाया था। उस के बाद १९६१ में आंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इसे प्रतिबंधित ड्रग्झ की श्रेणी में डाल दिया। उस समय भारत ने उस का विरोध किया कि हमारे यहां सामाजिक और धार्मिक परंपरा उस से जुडी हुई है। इस लिए प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।

मैं पहले स्पष्ट कर दूं कि मैं ना तो शराब के पक्ष में हूं ना गांजे के। और भांग का ग्लैमराइझेशन कुछ गानों के द्वारा हिन्दी फिल्मों में अवश्य हुआ है, किन्तु शराब की तुलना में बहोत अल्प।  किन्तु एक अभ्यास यह है कि अमरिका में जहां मेडिकल गांजे पर प्रतिबंध नहीं है वहां पैन किलर्स में कमी आई है एसा वॉशिंग्टन पॉस्ट का रिपॉर्ट है।

www.washingtonpost.com/news/wonk/wp/2016/07/13/one-striking-chart-shows-why-pharma-companies-are-fighting-legal-marijuana/

अब प्रश्न यह है कि भारत में गांजे पर प्रतिबंध कब लगाया गया? इस से पहले यह सोचिए कि अमरिका में इस के पर प्रतिबंध कब लगाया गया? एक थियरी यह है कि अमरिका में १९३० के दशक में भांग (Hemp) का उपयोग कागज, तेल, फर्निचर, कन्स्ट्रक्शन मटिरियल, वस्त्र आदि के लिए भी होता था। उस समय दारू, टिम्बर और उस समय नई प्लास्टिक इन्डस्ट्री की वृद्धि के आडे हेम्प बडी रुकावट था। हेम्प सरलता से उगाया जा सकता था। इस लिए कॉर्पोरेट कंपनीओ ने हेम्प पर प्रतिबंध लगवाया। इस के बाद जैसे की अमरिका की आदत है वह अपनी कंपनीयों के हित के लिए आंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध की मांग करने लगा।

हालांकि जैसे ओर चीजों में होता है, इस का दुरुपयोग बहोत होने लगा। हिप्पी समूह और युवाओ में ड्रग्झ बढ गया। राब के विषय में भी यही बात थी। किन्तु अमरिका के दबाव में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने नार्कॉटिक ड्रग्झ एन्ड साइकॉट्रॉपिक सबस्टन्स ऍक्ट (एनडीपीसी) अधिनियम बना दिया।

अब मेडिकल एक्स्पर्ट यह कहते है कि जब यह पाया गया है कि माराजुआना डायाबिटीझ, ज्वाइनडिस, केन्सर, डिप्रेशन और दर्द के उपचार में असरकारक औषधि साबित हुआ है तो भारत में इस के उपर प्रतिबंध क्यों है? अथर्ववेद में भांग के पौधे (cannabis sativa) को पवित्र पौधा माना गया है। वो इस के नशे के उपयोग के कारण नहीं, किन्तु दवाईयों में उपयोग के कारण। वह आयुर्वेद उद्योग की रीड की ह्डडी समान था। उसे पेनिसिलिन समान आयुर्वेदिक दवाई भी कहा जाता था।

अमरिका में तो बाद में २७ राज्यों ने मेडिकल आशय के लिए इसे कानूनी स्वीकृति दे दी।

www.forbes.com/sites/thomaspellechia/2018/01/22/alcohol-sales-dropped-15-percent-in-states-with-medical-marijuana-laws/#692c663b5f22

फॉर्ब्स की यह रिपॉर्ट के अनुसार, एक अभ्यास में यह पाया गया कि अमरिका में जहां मेडिकल माराजुआना को अनुमति है वहां शराब की बिक्री में १५ प्रतिशत कमी आई। तो माराजुआना से शराब, तम्बाकु, ओर तो ओर फार्मास्युटिकल कंपनीयों को बड़ा झटका लग सकता है। इस लिए इतना नेगेटिव चित्र इस के विरुद्ध बनाया गया है। हालांकि तम्बाकु के लिए भी बहोत नेगेटिव चित्र पीछले कुछ वर्षों में बना है। फिल्मों में शुरूआत में धूम्रपान विरोधी विज्ञापन भी आता है और इस के दृश्यों में धूम्रपान सेहत के लिए हानिकारक है ऐसा लिखना आवश्यक है। २०१३ में युपीए सरकार ने एक अच्छा निर्णय लिया था कि फिल्मों में शराब सेवन समय भी ऐसा संदेश दिखाया जाना चाहिए। तब विशाल भारद्वाज ने कहा था कि यदि ऐसा निर्णय हुआ तो मैं भूख हडताल कर दूंगा। ‘सत्यमेव जयते’ जैसे शॉ में आल्कॉहॉल पी कर शोषण करनेवालों पर एपिसॉड बनानेवाले आमीर खानने भी ऐसी चेतावनी दिखाने से सर्जनात्मकता नहीं रहती ऐसा निवेदन दे डाला था।

तो मित्रों, यह बात है कि शराब और भांग-गांजा जैसी वस्तुएं हानिकारक है, किन्तु भारत में शराब को ग्लैमराइझ किया गया। और आज उत्तर प्रदेश की योगी सरकार, दिल्ली की केजरीवाल सरकार, महाराष्ट्र की शिवसेना-एनसीपी-क़ॉंग्रेस की संयुक्त सरकार आदि कोरोना वाइरस जैसी स्थिति में भी शराब की दुकानें केवल इस लिए खोल रही है जिससे उस का खजाना भर जाए। किन्तु इस के कारण कोरोना ओर फेलेगा उस की उस को चिंता नहीं है। सावन जो आग लगाये उसे कौन बुझाएं…

और अंत में, फिर से एक बार, मेरा अंगत मत यह है कि दोनों ही हानिकारक है। किन्तु मेडिकली दोनों उपयोगी है। हालांकि हमारे यहां शराब से जितना नुकसान हुआ है वह बहोत ही अधिक है।

 

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1 comment

Kuldeep Laheru 06/05/2020 - 2:47 PM

वाह। अति सूक्ष्म अवलोकन के साथ लिखे गए यह लेख के जरिये अपने थोड़े में बहोत कुछ कह दिया।

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