बुनियाद और शरणार्थीओं की पीडा

बुनियाद और शरणार्थीओं की पीडा

by Jaywant Pandya
इतनी सी कम जगह में रहता था मास्टर हवेलीराम का पूरा परिवार। लाजोजी, हवेलीराम, रोशनलाल, सतबीर और बीच में तो कई दिन तक लाजो की समधन।
 
और कुछ भी चाहिए होता तो कागज मांगे जाते। आप को अपनी संपत्ति के क्लेइम भरना हो तो कागज भर के अरजी देनी पडती थी। कल दिखाया गया था कि कुलभूषण अपने पिता मास्टर हवेलीराम जिस को स्मृतिभ्रम हो गया है उस के पास अपनी लाहोरवाली हवेली के लिए क्लेइम भरने कागज लाता है।
 
यह सिरियल आज मोदी के जमाने की नहीं जो कि सीएए के लिए बनाई गई हो। यह राजीव गांधी के समय की है।
 
सोचिए कितनी तकलीफों से गुजरे होंगे कई हिन्दू और मुस्लिम। जो अपनी मातृभूमि छोडकर अब अलग-अलग देश बन चूके प्रदेश में आ गये।
 
और इस का कारण? एक कट्टर मानसिकता। हम को आप के साथ नहीं जमेगा। हमें अपना अलग देश चाहिए।
 
एसी ही स्थिति कश्मीर से पलायन हुए हिन्दू शरणार्थीओ के साथ हुई थी। राहुल पंडितने अपनी पुस्तक ‘अवर मून हेझ ब्लड क्लॉट्स’ में लिखा है कि उनके घर कितने टमाटर उगते थे कि वह टमाटर-बेट से खेलते थे। किन्तु जब वह स्वयं जम्मु में शरणार्थी बन गये तो दो-एक-आधा टमाटर लेने के लिए लाइन में खडा रहना पडता था।
 
सीएए विरोधी सेक्युलर हिन्दू हो या मुस्लिम उन को यह धारावाहिक अवश्य देखना चाहिए। और कागज नहीं दिखाएंगे एसी हठ से बहार आना चाहिए।

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