खिलाफत आंदोलन के नेता मुहम्मद अली गांधीजी को दुष्ट मुस्लिम से कमतर समजते थे !

खिलाफत आंदोलन के नेता मुहम्मद अली गांधीजी को दुष्ट मुस्लिम से कमतर समजते थे !

by Jaywant Pandya

भारत में अली बंधुओं-मोहम्मद और शौकत-के नेतृत्व में वर्ष १९२० में खिलाफत कमेटी बनी। इस मुद्दे की निरर्थकता गांधीजी भी भली-भांति समझते थे। लेकिन उनके लिए यह हिंदू-मुस्लिम एकता के एजेंडे को आगे बढ़ाने का एक स्वर्णिम अवसर था। खिलाफत आंदोलन को गांधी जी का साथ मिलने के बाद १९२३ में मौलाना मुहम्मद अली को कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया।मौलाना मोहम्मद अली ने यह एलान किया, ‘पैगंबर के बाद मैं गांधीजी के आदेश का पालन करना अपना फर्ज मानता हूं।’ इसके बाद मौलाना एक-दो बार बहके और भारत की आजादी के लिए अफगान सेना को भारत पर हमले की दावत देने की बात तक कह डाली। लेकिन खुद के भटक जाने के लिए गांधीजी से उन्होंने खेद भी प्रकट किया।

…९ सितम्बर को एक और हिन्दु-मुस्लिम दंगा छिड उठता है, लेकिन इस बार उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत के कोहाट इलाके में। गांधीजी वापिस दिल्ली आते है। वे इस बार मुहम्मद अली के घर ठहरना पसंद करते है। …..अचानक एसे मामलों में जैसी कि उनकी आदत थी, बिना किसी की सलाह लिए, वे यह घोषणा कर देते है कि वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए २१ दिन का उपवास करेंगे। सब ओर संत्रास छा जाता है, खास इस लिए, क्योंकि गांधीजी अपनी पीछली बीमारी के कारण अब भी कमजोर है। …महादेव देसाई लिखते है:

“मौलाना (मुहम्मद अली) के अनुनय-विनय में वह सारी नाराजगी भी शामिल थी, जो कि प्रेम जन्य होती है, “…हमारे साथ आपका यह समझौता हुआ था कि आप हर कदम हमारी सलाह से उठाएंगे। क्या वह समझौता काफुर हो गया?”

…”नहीं, हम दोनों खुदा के गुलाम है। हम दोनों उसके पास गिरवी है। आज मैं सलाह मशविरा करुंगा तो सिर्फ उस (खुदा) से।….” गांधीजी ने कहा।

किन्तु जैसे-जैसे कई महीने गुजरते चले जाते है, गांधीजी एक के बाद दूसरी जनसभा में यह कहते सुने जाते है कि उन्हें इस बात का बहुत अफसोस है कि अली बंधु, उनके साथ मंच पर नहीं है। …

…और जल्दी ही, वही मौलाना मुहम्मद अली, जो गांधीजी के पांव चूमा करते थे, जो उनके कदमों पर गिर जाया करते थे, जो तर-बतर आँसू बहाया करते थे, जिन्हों ने उन्हे हमारे युग का सर्वाधिक मसीहा तुल्य व्यक्ति कहा था, अलीगढ और फिर अजमेर में यह घोषणा करते है:

“गांधी का अखलाक, चाहे कितना भी पाक क्यों न हो, किंतु वह मुझे मजहब के नजरिए से, किसी भी मुसलमान से कमतर दिखाई देंगे, चाहे फिर वह मुसलमान बेअखलाक भी क्यों न हो।” (अखलाक = अच्छा आचरण) (अर्थात् मुहम्मद अली को दुष्ट आचरण वाला मुसलमान गांधी से ज्यादा अच्छा लगने लगा था)

जब मुहम्मद अली लखनउ के अमीनाबाद पार्क में आयोजित एक सभा में बोल रहे थे, तो उनसे पूछा गया कि क्या वे गांधीजी के बारे में वैसे जज्बात रखते है, जैसे कि सुनने में आए है? इस पर मुहम्मद अली ने बिना किसी हिचक या पश्चाताप के जवाब दिया:

“हाँ, मेरे मजहब और अकीदा के मुताबिक, मैं एक बदकार और गिरे हुए मुसलमान को भी गांधी से बेहतर मानता हूं।”

…जब विवाद बढने लगा तो मौलाना ने अपने बयान का कारण अपनी ओर से इस प्रकार स्पष्ट किया: स्वामी श्रद्धानंद को भेजे गए पत्र में उन्हों ने लिखा:

“मैं उनके (गांधीजी के) लिए इतना ज्यादा एहतराम और प्यार रखता हूं….लेकिन अकीदा (विश्वास) और असल अखलाक में बहुत बडा फर्क होता है। इस्लाम का पैरो होने का नाते मैं इस्लाम मजहब को किसी भी और एसे मजहब से अजीमतर मानने के लिए पाबंद हूं जिसे गैर इस्लामी मजहब के पैरो तस्लीम करते है। और इस लिहाज से बदकार और गिरे हुए मुसलमान का मजहब किसी भी गैर मुस्लिम के मजहब से उंचे मुकाम का हकदार है, फिर चाहे एसा शख्स खुद महात्मा गांधी भी क्यों न हो।”

काश! महात्मा गांधी को तभी समज में आ गया होता।

(ध्यानार्थ: मोहम्मद अली झीणा ने खिलाफत आंदोलन का विरोध किया तो उक्त मोहम्मद अली के भाई शौकत अली ने उनको पीटा था। और समाजवादी पार्टी के आझम खान ने मोहम्मद अली जौहर के नाम से खानगी युनिवर्सिटी भी बनाई जिन को युजीसी ने मान्यता भी दी।)

(संदर्भ: The world of Fatwas, By Arun Shourie. Ironies of History: Contradictions of the Khilafat movement by Hamza Alavi)

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4 comments

Vrinda Manjeet 03/09/2021 - 4:11 PM

At first I didn’t feel like reading further but the after reading Ali’s statement in favour and respect of Gandhiji compelled me to read the whole article.
You seem to be a voracious reader and that makes you write such aciculated article.
Please keep enlightening us with your knowledge.
Thank you

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Jaywant Pandya 04/09/2021 - 2:17 AM

Thank you Vrindaben.

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Shaileah Pandya 03/09/2021 - 9:56 PM

खिलाफत आंदोलन विश्व में एक मजहब की सत्ता स्थापने के उद्देश्य से शुरू किया गया एक धार्मिक उन्माद था, जिसके कारण कई निर्दोषों की हत्याएं हुई, आज भी ऐसे आंदोलन किसी अन्य रूप से चलाने की कोशिश हो रही है, ये आंदोलन चलाने वाले के पास कटोरा ले कर दुनिया में भीख मांगने के सिवाय अब तो कोई चारा नहीं है, पर लोगों को सावधान तो रहना ही पड़ेगा।

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Jaywant Pandya 04/09/2021 - 2:17 AM

सही कहा आपने।

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