हिन्दू के लिए पिता की गद्दी छिननेवाले कंस आदर्श नहीं

हिन्दू के लिए पिता की गद्दी छिननेवाले कंस आदर्श नहीं

by Jaywant Pandya
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(१) रामायण धारावाहिक में एक एक संवाद पारिवारिक दृष्टि से ही नहीं, राजनैतिक दृष्टि से भी अर्थपूर्ण है। प्रजाजन श्री राम के लिए विद्रोह के लिए तैयार थे। लेकिन श्री रामने एसा नहीं किया। प्रजाजन उन के साथ साथ वन में आने को तैयार थे लेकिन उन्हों ने कहा कि आप वापिस चले जाईये। वर्ना भरत को लगेगा मैंने विद्रोह के लिए प्रजजनो को भडकाया है।
 
(२) श्री राम ने अपने अभ्यास के समय निषाद राज गुह को अपना मित्र बनाया था। इसी मित्रप्रेमवत् वह गुह अपना राज्य वनवास में आये श्री राम को सोंपने को तैयार हो गये। श्री राम नहीं माने तो उन को वन का रास्ता दिखाने बहोत दूर तक साथ आये। (आज के हिसाब से निषाद ओबीसी समुदाय में आते है, और यह विक्शनरी का लेख देखिये जिस में निषाद को अनार्य बताकर आर्य और अनार्य एसा भेद पैदा करने का प्रयास किया गया है)
 
 
(३) महर्षि भारद्वाज (जो गोत्र के हिसाब से मेरे पूर्वज है) के सामने श्री राम बैठे लेकिन निषाद राज नीचे बैठे तब एक ब्राह्मण (यह उल्लेख सविशेष इस लिए क्योंकि दलितों को भडकाने के लिए वामपंथी लोग और दलित के नाम से मतांतरण करनेवाले ब्राह्मणवाद के नाम पर दलितो को भडकाते है) एसे भारद्वाज ने निषाद राज को श्री राम के बराबर वाले आसन पर बैठने को कहा।
 
(४) सीता के स्वयंवर से लेकर वनवास और वन में डगर-डगर पर सीताजी का सविशेष ध्यान रखा जाता है। दशरथ उन्हें वन में न जाने को कहते है। वशिष्ठ पत्नी अरुंधति भी कहती है। मुनिवेश की बात मंथरा के कहने पर कैकेयी करती है तो भी अरुंधति सीताजी को मुनिवेश धारण करने पर भी गहने न निकालने को कहती है। वनवास में भी सभी उन का सविशेष ध्यान रखते है। यह हिन्दू धर्म में स्त्रीओं का ऊंचा स्थान बताता है।
 
(५) निषाद राज गुह को अपने राज्य वापस जाने के लिए विदा करते समय श्री राम उन्हें कहते है कि अभी भरत अनुभवी नहीं है इस लिए यदि कोई शत्रु आक्रमण करे तो तुम अयोध्या का साथ देना। एक तरह से श्री राम वनवास में होते हुए भी और अपने परिवार से अपनी सौतेली माता से अन्याय होते हुए भी अपने राज्य- मातृभूमि की चिंता करते रहे। आज के परिप्रेक्ष्य में देखे तो शत्रु आक्रमण करे उस से पहले ही उन्हों ने एक मोरचा (Alliance) बना लिया। काश, जब विधर्मी आक्रांता हमला करते तब के राजाओ ने भी एसा एलायन्स बनाया होता। आज चुनावो में भी एसा मोरचा बनाया ही जाता है ना।
 
(६) रामायण काल में श्री रामने वनवास स्वीकार लिया तो बाद में उन को राज्य वापिस मिल गया। लेकिन महाभारत के समय आते आते समय बदल गया था। पांडु ने शब्दवेधी बाण चला कर गलती से प्राणी के स्थान पर ऋषि किंदम का वध कर दिया। यह बात उन के सिवा किसी को पता नहीं थी। लेकिन  उन्हों ने अपने बडे भ्राता धृतराष्ट्र को यह बात बताई और उन्हों ने स्वयं न्याय तोलते हुए अपने लिए वनवास स्वीकार कर लिया। इस के बाद उन की मृत्यु हो गई। पांडवो को अपना राज्य लेने के लिए युद्ध करना पडा। यह आज की राजनीति में देखे तो भाजप नेता एल. के. अडवाणी द्वारा हवाला घोटाले में नाम आने से सांसद पद से त्यागपत्र दे दिया था। वर्ना उस समय वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो सकते थे। वह बहोत ही लोकप्रिय थे। लेकिन केवल घोटाले में नाम आने पर एक बार त्यागपत्र दिया और हंमेशा  के लिए सत्ता से दूर हो गये।
 
(७) कंस ने अपने पिता से राज्य छिना था। उन्हे बंदी भी बना लिया था। एसे किस्से हिन्दू राजाओ में अल्प ही है। लेकिन कंस को कभी आदर्श नहीं माना गया। इस से उलट, औरंगझेब आदि मोगल बादशाह जो अपने पिता को बंदी बनाकर बादशाह बना। अपने भाई दारा शिकोह को फांसी दी। एसे औरंगझेब को पाकिस्तान में नायक माना जाता है। भारत में भी कुछ लोग उसे आदर्श मानते है। हिन्दूओ में पिता की गद्दी छिननेवाले को नहीं, पिता के वचन पूर्ण करने के लिए त्याग करनेवाले, वनवास के दुःख भोगनेवाले श्री राम को भगवान माना जाता है।
 
(८) भगवान माने क्या? जो अच्छे काम करते जाये, जो सुकीर्ति प्राप्त करे, सफलता प्राप्त करे, संघर्ष कर के सफलता प्राप्त करे एसे लोग। श्री राम ने अपने एक-एक कृत्य से एक के बाद एक सुकीर्ति और सन्मान पाते गये। उंच-नीच का भेद नहीं किया। परिवार को महत्त्व दिया। शक्ति और सत्ता का दुरुपयोग नहीं किया। इसी तरह अमिताभ बच्चन झंझीर से लेकर आज तक जिस प्रकर अपनी अनेक कृतिओं से दर्शको का सतत मन जीतते रहै तो उन को भगवान माननेवाले कई लोग है। एसा सचीन तेंडुलकर के बारे में है। एसा रजनीकांत के बारे में है। यहां यह कहने का प्रयास नहीं है कि अमिताभ सचमुच भगवान है। लेकिन भारत में भगवान उसी व्यक्तित्व को माना जाता है जो समाज के लिए जीता है, त्याग करता है, समाज के लिए लडता है।
 
इस अष्टम बातों के साथ कल श्री रामनवमी की अग्रीम शुभकामनाएं।

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